श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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१. माल्यवान् पर्वत दो माने गये हैं, एक तो दण्डकारण्यमें किष्किन्धाके समीप है और दूसरा मेरुपर्वतके निकट बताया गया है। ये दोनों पर्वत परस्पर इतने दूर हैं कि इनमें संघर्षकी कोई सम्भावना नहीं हो सकती। इसलिये ‘सपक्ष’ (पंखधारी) विशेषण दिया गया है। पाँखवाले पर्वत कदाचित् उड़कर एक-दूसरेके समीप पहुँच सकते हैं।
२. त्रिवेणु रथका वह अङ्ग है, जो जूएको धारण करता है। इसका पर्याय है युगन्धर।