भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1074

जो उसे भोजनके लिये अभीष्ट नहीं होते, उन जन्तुओंको वह उन्हीं हाथोंसे पीछे ढकेल देता था॥ ३१-३२ ॥

दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण जब उसके निकट पहुँचे, तब वह उनका रास्ता रोककर खड़ा हो गया। तब वे दोनों भाई उससे दूर हट गये और बड़े गौरसे उसे देखने लगे। उस समय वह एक कोस लंबा जान पड़ा। उस राक्षसकी आकृति केवल कबन्ध (धड़) के ही रुपमें थी, इसलिये वह कबन्ध कहलाता था। वह विशाल, हिंसापरायण, भयंकर तथा दो बड़ी-बड़ी भुजाओंसे युक्त था और देखनेमें अत्यन्त घोर प्रतीत होता था॥ ३३-३४ ॥

उस महाबाहु राक्षसने अपनी दोनों विशाल भुजाओंको फैलाकर उन दोनों रघुवंशी राजकुमारोंको बलपूर्वक पीड़ा देते हुए एक साथ ही पकड़ लिया॥ ३५ ॥

दोनोंके हाथोंमें तलवारें थीं, दोनोंके पास मजबूत धनुष थे और वे दोनों भाई प्रचण्ड तेजस्वी, विशाल भुजाओंसे युक्त तथा महान् बलवान् थे तो भी उस राक्षसके द्वारा खींचे जानेपर विवशताका अनुभव करने लगे॥ ३६ ॥

उस समय वहाँ शूरवीर रघुनन्दन श्रीराम तो धैर्यके कारण व्यथित नहीं हुए, परंतु बालबुद्धि होने तथा धैर्यका आश्रय न लेनेके कारण लक्ष्मणके मनमें बड़ी व्यथा हुई॥ ३७ ॥

तब श्रीरामके छोटे भाई लक्ष्मण विषादग्रस्त हो श्रीरघुनाथजीसे बोले—'वीरवर! देखिये, मैं राक्षसके वशमें पड़कर विवश हो गया हूँ॥ ३८ ॥

'रघुनन्दन! एकमात्र मुझे ही इस राक्षसको भेंट देकर आप स्वयं इसके बाहुबन्धनसे मुक्त हो जाइये। इस भूतको मेरी ही बलि देकर आप सुखपूर्वक यहाँसे निकल भागिये॥ ३९ ॥

'मेरा विश्वास है कि आप शीघ्र ही विदेह-राजकुमारीको प्राप्त कर लेंगे। ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम! वनवाससे लौटनेपर पिता-पितामहोंकी भूमिको अपने अधिकारमें लेकर जब आप राजसिंहासनपर विराजमान होइयेगा, तब वहाँ सदा मेरा भी स्मरण करते रहियेगा'॥ ४० १/२ ॥

लक्ष्मणके ऐसा कहनेपर श्रीरामने उन सुमित्रा-कुमारसे कहा—'वीर! तुम भयभीत न होओ। तुम्हारे-जैसे शूरवीर इस तरह विषाद नहीं करते हैं'॥ ४१ १/२ ॥

इसी बीचमें क्रूर हृदयवाले दानवशिरोमणि महाबाहु कबन्धने उन दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणसे कहा—॥ ४२ १/२ ॥