श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1084, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ें‘सुग्रीवका मनोरथ पूर्ण हो या न हो, वे आपका कार्य अवश्य सिद्ध करेंगे। वे ऋक्षरजाके क्षेत्रज पुत्र हैं और वालीसे शङ्कित रहकर पम्पासरोवरके तटपर भ्रमण करते हैं॥ २० ॥
‘उन्हें सूर्यदेवका औरस पुत्र कहा गया है। उन्होंने वालीका अपराध किया है (इसीलिये वे उससे डरते हैं)। रघुनन्दन! अग्निके समीप हथियार रखकर शीघ्र ही सत्यकी शपथ खाकर ऋष्यमूकनिवासी वनचारी वानर सुग्रीवको आप अपना मित्र बना लीजिये॥ २१ १/२ ॥
‘कपिश्रेष्ठ सुग्रीव संसारमें नरमांसभक्षी राक्षसोंके जितने स्थान हैं, उन सबको पूर्णरूपसे निपुणतापूर्वक जानते हैं॥ २२ १/२ ॥
‘रघुनन्दन! शत्रुदमन! सहस्रों किरणोंवाले सूर्यदेव जहाँतक तपते हैं, वहाँतक संसारमें कोऽ ऐसा स्थान या वस्तु नहीं है, जो सुग्रीवके लिये अज्ञात हो॥ २३ १/२ ॥
‘वे वानरोंके साथ रहकर समस्त नदियों, बड़े-बड़े पर्वतों, पहाड़ी दुर्गम स्थानों और कन्दराओंमें भी खोज कराकर आपकी पत्नीका पता लगा लेंगे॥ २४ १/२ ॥
‘राघव! वे आपके वियोगमें शोक करती हुऽ सीताकी खोजके लिये सम्पूर्ण दिशाओंमें विशालकाय वानरोंको भेजेंगे, तथा रावणके घरसे भी सुन्दर अङ्गोंवाली मिथिलेशकुमारीको ढूँढ़ निकालेंगे॥ २५-२६ ॥
‘आपकी प्रिया सती-साध्वी सीता मेरुशिखरके अग्रभागपर पहुँचायी गयी हों या पातालमें प्रवेश करके रखी गयी हों, वानरशिरोमणि सुग्रीव समस्त राक्षसोंका वध करके उन्हें पुनः आपके पास ला देंगे’॥ २७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें बहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७२॥
* संधि आदिका विवेचन पृष्ठ ३४१ की टिप्पणीमें देखना चाहिये। ४९१