श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1133, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ें‘ये कंकपक्षीके परोंसे युक्त हैं और इन्द्रके वज्रकी भाँति अमोघ हैं। इनकी गाँठें सुन्दर और अग्रभाग तीखे हैं। ये रोषमें भरे भुजङ्गोंकी भाँति भयंकर हैं॥ २३ ॥
‘इन बाणोंसे तुम अपने वाली नामक शत्रुको, जो भाई होकर भी तुम्हारी बुराई कर रहा है, विदीर्ण हुए पर्वतकी भाँति मरकर पृथ्वीपर पड़ा देखोगे’॥ २४ ॥
श्रीरघुनाथजीकी यह बात सुनकर वानरसेनापति सुग्रीवको अनुपम प्रसन्नता प्राप्त हुई और वे उन्हें बारंबार साधुवाद देते हुए बोले—॥ २५ ॥
‘श्रीराम! मैं शोकसे पीड़ित हूँ और आप शोकाकुल प्राणियोंकी परमगति हैं। मित्र समझकर मैं आपसे अपना दुःख निवेदन करता हूँ॥ २६ ॥
‘मैंने आपके हाथमें हाथ देकर अग्निदेवके सामने आपको अपना मित्र बनाया है। इसलिये आप मुझे अपने प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हैं। यह बात मैं सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ॥ २७ ॥
‘आप मेरे मित्र हैं, इसलिये आपपर पूर्ण विश्वास करके मैं अपने भीतरका दुःख, जो सदा मेरे मनको व्याकुल किये रहता है, आपको बता रहा हूँ’॥ २८ ॥
इतनी बात कहते-कहते सुग्रीवके नेत्रोंमें आँसू भर आये। उनकी वाणी अश्रुगद्गद हो गयी। इसलिये वे उच्च स्वरसे बोलनेमें समर्थ न हो सके॥ २९ ॥
तत्पश्चात् सुग्रीवने सहसा बढ़े हुए नदीके वेगके समान उमड़े हुए आँसुओंके वेगको श्रीरामके समीप धैर्यपूर्वक रोका॥ ३० ॥
आँसुओंको रोककर अपने दोनों सुन्दर नेत्रोंको पोंछनेके पश्चात् तेजस्वी सुग्रीव पुनः लंबी साँस खींचकर श्रीरघुनाथजीसे बोले—॥ ३१ ॥
‘श्रीराम! पहलेकी बात है, बलिष्ठ वालीने कटुवचन सुनाकर बलपूर्वक मेरा तिरस्कार किया और अपने राज्य (युवराजपद) से नीचे उतार दिया॥ ३२ ॥
‘इतना ही नहीं, मेरी स्त्रीको भी, जो मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय है; उसने छीन लिया और जितने मेरे सुहृद् थे, उन सबको कैदमें डाल दिया॥ ३३ ॥
‘रघुनन्दन! इसके बाद भी वह दुरात्मा वाली मेरे विनाशके लिये यत्न करता रहता है। उसके भेजे हुए बहुत-से वानरोंका मैं वध कर चुका हूँ॥ ३४ ॥