श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२ ॥
‘यहाँ आहवनीय आदि त्रिविध अग्नियाँ भी प्रज्वलित होती हैं। यह कबूतरके अंगोंकी भाँति धूसर रंगवाला घना धूम उठता दिखायी देता है, जो वृक्षोंकी शिखाओंको आवेष्टित-सा कर रहा है॥ २३ ॥
‘जिनके शिखाओंपर होम-धूम छा रहे हैं, वे ये वृक्ष मेघसमूहोंसे आच्छादित हुए नीलमके पर्वतोंकी भाँति प्रकाशित हो रहे हैं॥ २४ ॥
‘धर्मात्मा रघुनन्दन! आप मनको एकाग्र करके दोनों हाथ जोड़कर भाई लक्ष्मणके साथ उन मुनियोंके उद्देश्यसे प्रणाम कीजिये॥ २५ ॥
‘श्रीराम! जो उन पवित्र अन्तःकरणवाले ऋषियोंको प्रणाम करते हैं, उनके शरीरमें किंचिन्मात्र भी अशुभ नहीं रह जाता है’॥ २६ ॥
तब भाई लक्ष्मणसहित श्रीरामने हाथ जोड़कर उन महात्मा ऋषियोंके उद्देश्यसे प्रणाम किया॥ २७ ॥
धर्मात्मा श्रीराम, उनके छोटे भाई लक्ष्मण, सुग्रीव तथा अन्य सभी वानर उन ऋषियोंको प्रणाम करके प्रसन्नचित्त हो आगे बढ़े॥ २८ ॥
उस सप्तजनाश्रमसे दूरतकका मार्ग तय कर लेनेके पश्चात् उन सबने वालीद्वारा सुरक्षित किष्किन्धापुरीको देखा॥
तदनन्तर श्रीरामके छोटे भाई लक्ष्मण, श्रीराम तथा वानर, जिनका उग्रतेज उदित हुआ था, हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र लेकर इन्द्रकुमार वालीके पराक्रमसे पालित किष्किन्धापुरीमें शत्रुवधके निमित्त पुनः आ पहुँचे॥ ३० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें तेरहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १३॥