भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1163

‘सुग्रीव पहले भी यहाँ आये थे और क्रोधपूर्वक उन्होंने आपको युद्धके लिये ललकारा था। उस समय आपने नगरसे निकलकर उन्हें परास्त किया और वे आपकी मार खाकर सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर भागते हुए मातङ्ग वनमें चले गये थे॥ १० ॥

‘इस प्रकार आपके द्वारा पराजित और विशेष पीड़ित होनेपर भी वे पुनः यहाँ आकर आपको युद्धके लिये ललकार रहे हैं। उनका यह पुनरागमन मेरे मनमें शङ्का-सी उत्पन्न कर रहा है॥ ११ ॥

‘इस समय गर्जते हुए सुग्रीवका दर्प और उद्योग जैसा दिखायी देता है तथा उनकी गर्जनामें जो उत्तेजना जान पड़ती है, इसका कोऽइ छोटा-मोटा कारण नहीं होना चाहिये॥ १२ ॥

‘मैं समझती हूँ सुग्रीव किसी प्रबल सहायकके बिना अबकी बार यहाँ नहीं आये हैं। किसी सबल सहायकको साथ लेकर ही आये हैं, जिसके बलपर ये इस तरह गरज रहे हैं॥ १३ ॥

‘वानर सुग्रीव स्वभावसे ही कार्यकुशल और बुद्धिमान् हैं। वे किसी ऐसे पुरुषके साथ मैत्री नहीं करेंगे, जिसके बल और पराक्रमको अच्छी तरह परख न लिया हो॥ १४ ॥

‘वीर! मैंने पहले ही कुमार अङ्गदके मुँहसे यह बात सुन ली है। इसलिये आज मैं आपके हितकी बात बताती हूँ॥ १५ ॥

‘एक दिन कुमार अङ्गद वनमें गये थे। वहाँ गुप्तचरोंने उन्हें एक समाचार बताया, जो उन्होंने यहाँ आकर मुझसे भी कहा था॥ १६ ॥

‘वह समाचार इस प्रकार है—अयोध्यानरेशके दो शूर-वीर पुत्र, जिन्हें युद्धमें जीतना अत्यन्त कठिन है, जिनका जन्म इक्ष्वाकुकुलमें हुआ है तथा जो श्रीराम और लक्ष्मणके नामसे प्रसिद्ध हैं, यहाँ वनमें आये हुए हैं॥ १७ ॥

‘वे दोनों दुर्जय वीर सुग्रीवका प्रिय करनेके लिये उनके पास पहुँच गये हैं। उन दोनोंमेंसे जो आपके भाऽइके युद्ध-कर्ममें सहायक बताये गये हैं, वे श्रीराम शत्रुसेनाका संहार करनेवाले तथा प्रलयकालमें प्रज्वलित हुऽइ अग्निके समान तेजस्वी हैं। वे साधु पुरुषोंके आश्रयदाता कल्पवृक्ष हैं और संकटमें पड़े हुए प्राणियोंके लिये सबसे बड़ा सहारा हैं॥ १८-१९ ॥

‘आर्त पुरुषोंके आश्रय, यशके एकमात्र भाजन, ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न तथा पिताकी आज्ञामें स्थित रहनेवाले हैं॥ २० ॥