श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(फिर वालीसे बोली—) ‘वानरेश्वर! मैं आपकी प्यारी पत्नी हूँ और इस तरह रोती-कलपती हूँ, फिर भी आप मुझसे बोलते क्यों नहीं हैं? देखिये, आपकी ये बहुत-सी सुन्दरी भार्याएँ यहाँ उपस्थित हैं’॥ २२ ॥
ताराका विलाप सुनकर अन्य वानर-पत्नियां भी सब ओरसे अङ्गदको पकड़कर दीन एवं दुःखसे व्याकुल हो जोर-जोरसे क्रन्दन करने लगीं॥ २३ ॥
(तदनन्तर ताराने फिर कहा—) ‘बाजूबन्दसे विभूषित वीर भुजाओंवाले वानरराज! आप अङ्गदको छोड़कर दीर्घकालके लिये दूसरे देशमें क्यों जा रहे हैं? जो गुणोंमें आपके सर्वथा निकट है—जो आपके समान ही गुणवान् है तथा जिसका प्रिय एवं मनोहर वेश है, ऐसे प्रिय पुत्रको त्यागकर इस प्रकार चला जाना आपके लिये कदापि उचित नहीं है॥ २४ ॥
‘महाबाहो! यदि नासमझीके कारण मैंने आपका कोई अपराध किया हो तो आप उसे क्षमा कर दें। वानरवंशके स्वामी वीर आर्यपुत्र! मैं आपके चरणोंमें मस्तक रखकर यह प्रार्थना करती हूँ’॥ २५ ॥
इस प्रकार अन्य वानर-पत्नियोंके साथ पतिके समीप करुण विलाप करती हुई अनिन्द्य सुन्दरी ताराने जहाँ वाली पृथ्वीपर पड़ा था, वहीं उसके समीप बैठकर आमरण अनशन करनेका निश्चय किया॥ २६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २०॥