श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘ताराका यह तेजस्वी पुत्र तुम्हारे समान ही पराक्रमी है। उन राक्षसोंके वधके समय यह सदा तुम्हारे आगे रहेगा॥ ११ ॥
‘यह बलवान् तेजस्वी तरुण ताराकुमार अङ्गद रणभूमिमें पराक्रम प्रकट करते हुए अपने योग्य कर्म करेगा॥ १२ ॥
‘सुषेणकी पुत्री यह तारा सूक्ष्म विषयोंके निर्णय करने तथा नाना प्रकारके उत्पातोंके चिह्नोंको समझनेमें सर्वथा निपुण है॥ १३ ॥
‘जिस कार्यको अच्छा बताये, उसे संदेहरहित होकर करना। ताराकी किसी भी सम्मतिका परिणाम उलटा नहीं होता॥ १४ ॥
‘श्रीरामचन्द्रजीका काम तुम्हें निःशङ्क होकर करना चाहिये। उसको न करनेसे तुम्हें पाप लगेगा और अपमानित होनेपर श्रीरामचन्द्रजी तुझे मार डालेंगे॥ १५ ॥
‘सुग्रीव! मेरी यह सोनेकी दिव्यमाला तुम धारण कर लो। इसमें उदार लक्ष्मीका वास है। मेरे मर जानेपर इसकी श्री नष्ट हो जायगी। अतः अभीसे पहन लो'॥ १६ ॥
वालीने भ्रातृस्नेहके कारण जब ऐसी बातें कहीं, तब उसके वधके कारण जो हर्ष हुआ था, उसे त्यागकर सुग्रीव फिर दुःखी हो गये, मानो चन्द्रमापर ग्रहण लग गया हो॥ १७ ॥
वालीके उस वचनसे सुग्रीवका वैरभाव शान्त हो गया। वे सावधान होकर उचित बर्ताव करने लगे। उन्होंने भाईकी आज्ञासे वह सोनेकी माला ग्रहण कर ली॥ १८ ॥
सुग्रीवको वह सुवर्णमयी माला देनेके पश्चात् वालीने मरनेका निश्चय कर लिया। फिर अपने सामने खड़े हुए पुत्र अङ्गदकी ओर देखकर स्नेहके साथ कहा—॥ १९ ॥
‘बेटा! अब देश-कालको समझो—कब और कहाँ कैसा बर्ताव करना चाहिये, इसका निश्चय करके वैसा ही आचरण करो। समयानुसार प्रिय-अप्रिय, सुख-दुःख—जो कुछ आ पड़े उसको सहो। अपने हृदयमें क्षमाभाव रखो और सदा सुग्रीवकी आज्ञाके अधीन रहो॥ २० ॥
‘महाबाहो! सदा मेरा दुलार पाकर जिस प्रकार तुम रहते आये हो, यदि वैसा ही बर्ताव अब भी करोगे तो सुग्रीव तुम्हारा विशेष आदर नहीं करेंगे॥ २१ ॥
‘शत्रुदमन अङ्गद! तुम इनके शत्रुओंका साथ मत दो। जो इनके मित्र न हों, उनसे भी न मिलो और अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखकर सदा अपने स्वामी सुग्रीवके कार्य-साधनमें संलग्न रहते हुए उन्हींके अधीन रहो॥ २२ ॥