भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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धर्मार्थकाममोक्षाणामुपदेशसमन्वितम्।
पूर्ववृत्तं कथायुक्तमितिहासं प्रचक्षते॥

(विष्णुधर्म० ३। १५। १)

और विस्तृत एवं दीर्घकालिक विश्वका इतिहास तो रामायण-महाभारतकी भाँति ही हो सकता है और धर्म, अर्थ, लोक-व्यवहार, परलोक-सुखकी दृष्टिसे वही लाभकर भी सिद्ध हो सकता है।

भौगोलिक विवरण

रामायणके भूगोलपर भी बहुत अनुसंधान हुआ है। ‘कल्याण’का रामायणाङ्क, कनिङ्घमकी ‘ऐन्शेन्ट डिक्शनरी’, श्रीदेके ‘जागरफिकल डिक्शनरी’में इसपर बहुत अनुसंधान है। कॆई लोगोंने स्वतन्त्र लेख भी लिखे हैं। लंदनके ‘एशियाटिक सोसाइटी जर्नल’ में एक महत्त्वपूर्ण लेख छपा था। ‘वेद धरातल’ (पं० गिरीशचन्द्र) में भी कुछ अच्छी सामग्री है। केवल ‘लंका’ पर ही कॆई प्रबन्ध हैं। ‘सर्वेश्वर’ के एक लेखमें ‘मालदीप’ को लंका सिद्ध किया है। कुछ लोग इसे ध्वस्त, मज्जित या दुर्ज्ञेय भी मानते हैं। वाल्मी० १। २२ की कौशाम्बी प्रयागसे १४ मील दक्षिण-पश्चिम कोसम गाँव है। धर्मारण्य आजकी गया है। ‘महोदय’ नगर कुशनाभकी कन्याओंके कुब्ज होनेसे आगे चलकर कान्यकुब्ज,^{१०} पुनः कन्नौज हुआ, गिरिव्रज ‘राजगिर’ (बिहार) है। १। २४ के मलद-करूष आरा जिलेके उत्तरी भाग हैं। केकयदेश कुछ लोग ‘गजनी’ को और कुछ झेलम एवं कीकनाको कहते हैं। बालकाण्ड २। ३-४ में आयी तमसा नदीपर वाल्मीकिजीका आश्रम था। यह उस तमसासे सर्वथा भिन्न है, जिसका उल्लेख गङ्गाके उत्तर तथा अयोध्याके दक्षिणमें मिलता है। वाल्मीकि-आश्रमका उल्लेख २। ५६। १६ में भी आया है। पश्चिमोत्तरशाखीय रामायणके २। ११४ में भी इस आश्रमका उल्लेख है। बी० एच० वडेरने ‘कल्याण’ रामायणाङ्कके ४९६ पृष्ठपर इसे प्रयागसे २० मील दक्षिण लिखा है। सम्मेलनपत्रिका ४३। २ के १३३ पृष्ठपर वाल्मीकि-आश्रम प्रयाग-झाँसीरोड और राजापुर-मानिकपुर रोडके सङ्गमपर स्थित बतलाया गया है। गोस्वामी तुलसीदासजीके मतसे इनका आश्रम ‘वारिपुर दिगपुर बीच (विलसतिभूमि)’ था। मूल गोसांईंचरितकार ‘दिगवारिपुरा बीच सीतामढ़ी’ को वाल्मीकि-आश्रम मानते हैं। कुछ लोग कानपुरके बिठूरको भी वाल्मीकाश्रम मानते हैं।^{११} २। ५६। १६ की टीकामें कतक, तीर्थ, गोविन्दराज, शिरोमणिकार आदि इनका समाधान करते हुए लिखते हैं कि ऋषि प्रायः घूमते रहते थे। श्रीरामके वनवासके समय वे चित्रकूटके समीप तथा