श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1204, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ें‘(मेरे द्वारा मारे जानेके कारण) वानरराज वाली शरीरसे मुक्त हो अपने शुद्ध स्वरूपको प्राप्त हुए हैं। नीतिशास्त्रके अनुकूल साम, दान और अर्थके समुचित प्रयोगसे मिलनेवाले जो पवित्र कर्म हैं, वे सभी उन्हें प्राप्त हो गये॥ ९॥
‘महात्मा वालीने पहले अपने धर्मके संयोगसे जिसपर विजय पायी थी, उसी स्वर्गको इस समय युद्धमें प्राणोंकी रक्षा न करके उन्होंने अपने हाथमें कर लिया है॥ १०॥
‘यही सर्वश्रेष्ठ गति है, जिसे वानरोंके सरदार वालीने प्राप्त किया है। अतः अब उनके लिये शोक करना व्यर्थ है। इस समय तुम्हारे सामने जो कर्तव्य उपस्थित है, उसे पूरा करो’॥ ११॥
श्रीरामचन्द्रजीकी बात समाप्त होनेपर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले लक्ष्मणने, जिनकी विवेकशक्ति नष्ट हो गयी थी, उन सुग्रीवसे नम्रतापूर्वक इस प्रकार कहा—॥
‘सुग्रीव! अब तुम अङ्गद और ताराके साथ रहकर वालीके दाह-संस्कार-सम्बन्धी प्रेतकार्य करो॥ १३॥
‘सेवकोंको आज्ञा दो—वे वालीके दाह-संस्कारके निमित्त प्रचुर मात्रामें सूखी लकड़ियाँ और दिव्य चन्दन ले आवें॥ १४॥
‘अङ्गदका चित्त बहुत दुःखी हो गया है। इन्हें धैर्य बँधाओ। तुम अपने मनमें मूढ़ता न लाओ—किंकर्तव्यविमूढ़ न बनो; क्योंकि यह सारा नगर तुम्हारे ही अधीन है॥ १५॥
‘अङ्गद पुष्पमाला, नाना प्रकारके वस्त्र, घी, तेल, सुगन्धित पदार्थ तथा अन्य सामान, जिनकी अभी आवश्यकता है, स्वयं ले आवें॥ १६॥
‘तार! तुम शीघ्र जाकर वेगपूर्वक एक पालकी ले आओ; क्योंकि इस समय अधिक फुर्ती दिखानी चाहिये। ऐसे अवसरपर वही लाभदायक होती है॥ १७॥
‘पालकीको उठाकर ले चलनेके योग्य जो बलवान् एवं समर्थ वानर हों, वे तैयार हो जायँ। वे ही वालीको यहाँसे श्मशानभूमिमें ले चलेंगे’॥ १८॥
सुग्रीवसे ऐसा कहकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले सुमित्रानन्दन लक्ष्मण अपने भाईके पास जाकर खड़े हो गये॥ १९॥
लक्ष्मणकी बात सुनकर तारके मनमें हड़बड़ी मच गयी। वह शिबिका ले आनेके लिये शीघ्रतापूर्वक किष्किन्धा नामक गुफामें गया॥ २०॥