श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1289, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ें‘पारियात्र पर्वतके पास ही समुद्रमें वज्रनामसे प्रसिद्ध एक बहुत ऊँचा पर्वत है, जो नाना प्रकारके वृक्षों और लताओंसे व्याप्त दिखायी देता है। वह वज्रगिरि वैदूर्यमणिके समान नील वर्णका है। वह कठोरतामें वज्रमणि (हीरे) के समान है॥ २५ ॥
‘वह सुन्दर पर्वत वहाँ सौ योजनके घेरेमें प्रतिष्ठित है। उसकी लंबाऽइ और चौड़ाऽइ दोनों बराबर हैं। वानरो! उस पर्वतपर बहुत-सी गुफाएँ हैं। उन सबमें प्रयत्नपूर्वक सीताका अनुसंधान करना चाहिये॥ २६ ॥
‘समुद्रके चतुर्थ भागमें चक्रवान् नामक पर्वत है। वहीं विश्वकर्माने सहस्रार* चक्रका निर्माण किया था॥ २७ ॥
‘वहींसे पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु पञ्चजन और हयग्रीव नामक दानवोंका वध करके पाञ्चजन्य शङ्ख तथा वह सहस्रार सुदर्शन चक्र लाये थे॥ २८ ॥
‘चक्रवान् पर्वतके रमणीय शिखरों और विशाल गुफाओंमें भी इधर-उधर वैदेहीसहित रावणका पता लगाना चाहिये॥ २९ ॥
‘उससे आगे समुद्रकी अगाध जलराशिमें सुवर्णमय शिखरोंवाला वराह नामक पर्वत है, जिसका विस्तार चौंसठ योजनकी दूरीमें है॥ ३० ॥
‘वहीं प्राग्ज्योतिष नामक सुवर्णमय नगर है, जिसमें दुष्टात्मा नरक नामक दानव निवास करता है॥ ३१ ॥
‘उस पर्वतके रमणीय शिखरोंपर तथा वहाँकी विशाल गुफाओंमें सीतासहित रावणकी तलाश करनी चाहिये॥ ३२ ॥
‘जिसका भीतरी भाग सुवर्णमय दिखायी देता है, उस पर्वतराज वराहको लाँघकर आगे बढ़नेपर एक ऐसा पर्वत मिलेगा, जिसका सब कुछ सुवर्णमय है तथा जिसमें लगभग दस सहस्र झरने हैं॥ ३३ ॥
‘उसके चारों ओर हाथी, सूअर, सिंह और व्याघ्र सदा गर्जना करते हैं और अपनी ही गर्जनाकी प्रतिध्वनिके शब्दसे दर्पमें भरकर पुनः दहाड़ने लगते हैं॥ ३४ ॥
‘उस पर्वतका नाम है मेघगिरि। जिसपर देवताओोंने हरित रंगके अश्ववाले श्रीमान् पाकशासन इन्द्रको राजाके पदपर अभिषिक्त किया था॥ ३५ ॥