भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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तैंतालीसवाँ सर्ग

सुग्रीवका उत्तर दिशाके स्थानोंका परिचय देते हुए शतबलि आदि वानरोंको वहाँ भेजना

इस प्रकार अपने श्वशुरको पश्चिम दिशाकी ओर जानेका संदेश दे सर्वज्ञ, सर्व-वानर-शिरोमणि वानरेश्वर राजा सुग्रीव अपने हितैषी शतबलि नामक वीर वानरसे श्रीरामचन्द्रजीके हितकी बात बोले— ॥ १-२ ॥

‘पराक्रमी वीर! तुम अपने ही समान एक लाख वनवासी वानरोंको जो यमराजके बेटे हैं, साथ लेकर अपने समस्त मन्त्रियोंसहित उस उत्तर दिशामें प्रवेश करो, जो हिमालयरूपी आभूषणोंसे विभूषित है और वहाँ सब ओर यशस्विनी श्रीरामपत्नी सीताका अन्वेषण करो॥ ३-४ ॥

‘अपने मुख्य प्रयोजनको समझनेवाले वीरोंमें श्रेष्ठ वानरो! यदि हमलोगोंके द्वारा दशरथनन्दन भगवान् श्रीरामका यह प्रिय कार्य सम्पन्न हो जाय तो हम उनके उपकारके ऋणसे मुक्त और कृतार्थ हो जायँगे॥ ५ ॥

‘महात्मा श्रीरघुनाथजीने हमलोगोंका प्रिय कार्य किया है। उसका यदि कुछ बदला दिया जा सके तो हमारा जीवन सफल हो जाय॥ ६ ॥

‘जिसने कोऽइ उपकार न किया हो, वह भी यदि किसी कार्यके लिये प्रार्थी होकर आया हो तो जो पुरुष उसके कार्यको सिद्ध कर देता है, उसका जन्म भी सफल हो जाता है। फिर जिसने पहलेके उपकारीके कार्यको सिद्ध किया हो, उसके जीवनकी सफलताके विषयमें तो कहना ही क्या है॥ ७ ॥

‘इसी विचारका आश्रय लेकर मेरा प्रिय और हित चाहनेवाले तुम सब वानरोंको ऐसा प्रयत्न करना चाहिये, जिससे जनकनन्दिनी सीताका पता लग जाय॥ ८ ॥

‘शत्रुओंकी नगरीपर विजय पानेवाले ये नरश्रेष्ठ श्रीराम समस्त प्राणियोंके लिये माननीय हैं। हमलोगोंपर भी इनका बहुत प्रेम है॥ ९ ॥

‘तुम सब लोग बुद्धि और पराक्रमके द्वारा इन अत्यन्त दुर्गम प्रदेशों, पर्वतों और नदियोंके तटोंपर जा-जाकर सीताकी खोज करो॥ १० ॥