श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऐसा विचारकर महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी कार्यसाधनके उद्योगमें सर्वश्रेष्ठ हनुमान्जीकी ओर दृष्टिपात करके अपनेको कृतार्थ-सा मानते हुए प्रसन्न हो गये। उनकी सारी इन्द्रियाँ और मन हर्षसे खिल उठे॥
तदनन्तर शत्रुओंको संताप देनेवाले श्रीरामने प्रसन्नतापूर्वक अपने नामके अक्षरोंसे सुशोभित एक अँगूठी हनुमान्जीके हाथमें दी, जो राजकुमारी सीताको पहचानके रूपमें अर्पण करनेके लिये थी॥ १२ ॥
अँगूठी देकर वे बोले— 'कपिश्रेष्ठ! इस चिह्नके द्वारा जनककिशोरी सीताको यह विश्वास हो जायगा कि तुम मेरे पाससे ही गये हो। इससे वह भय त्यागकर तुम्हारी ओर देख सकेगी॥ १३ ॥
‘वीरवर! तुम्हारा उद्योग, धैर्य, पराक्रम और सुग्रीवका संदेश—ये सब मुझे इस बातकी सूचना-सी दे रहे हैं कि तुम्हारे द्वारा कार्यकी सिद्धि अवश्य होगी'॥ १४ ॥
वानरश्रेष्ठ हनुमान्ने वह अँगूठी लेकर उसे मस्तकपर रखा और फिर हाथ जोड़कर श्रीरामके चरणोंमें प्रणाम करके वे वानरशिरोमणि वहाँसे प्रस्थित हुए॥ १५ ॥
उस समय वीर-वानर पवनकुमार हनुमान् अपने साथ वानरोंकी उस विशाल सेनाको ले जाते हुए उसी तरह शोभा पाने लगे, जैसे मेघरहित आकाशमें विशुद्ध (निर्मल) मण्डलसे उपलक्षित चन्द्रमा नक्षत्र-समूहोंके साथ सुशोभित होता है॥ १६ ॥
जाते हुए हनुमान्को सम्बोधित करके श्रीरामचन्द्रजीने फिर कहा— 'अत्यन्त बलशाली कपिश्रेष्ठ! मैंने तुम्हारे बलका आश्रय लिया है। पवनकुमार हनुमान्! जिस प्रकार भी जनकनन्दिनी सीता प्राप्त हो सके, तुम अपने महान् बल-विक्रमसे वैसा ही प्रयत्न करो। अच्छा, अब जाओ'॥ १७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें चौवालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४४॥