श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकालीनोंकी राशियाँ तथा मृगचर्मोंके समूह जहाँ-तहाँ रखे हुए थे। वे सब अग्निके समान प्रभासे उद्दीप्त हो रहे थे। वानरोंने वहाँ चमकीले सुवर्णके ढेर भी देखे॥ ३२—३७१/२ ॥
उस गुफामें जहाँ-तहाँ खोज करते हुए उन महातेजस्वी शूरवीर वानरोंने थोड़ी ही दूरपर किसी स्त्रीको भी देखा, जो वल्कल और काला मृगचर्म पहनकर नियमित आहार करती तपस्यामें संलग्न थी और अपने तेजसे दिप रही थी। वानरोंने वहाँ उसे बड़े ध्यानसे देखा और आश्चर्यचकित होकर सब ओर खड़े रहे। उस समय हनुमान्जीने उससे पूछा—‘देवि! तुम कौन हो और यह किसकी गुफा है?’॥ ३८—४० ॥
पर्वतके समान विशालकाय हनुमान्जीने हाथ जोड़कर उस वृद्धा तपस्विनीको प्रणाम किया और पूछा—‘देवि! तुम कौन हो? यह गुफा, ये भवन तथा ये रत्न किसके हैं? यह हमें बताओ’॥ ४१ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें पचासवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५० ॥