भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 1317, कुल 2621 में से

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पृष्ठ 1317

‘उसने एक सहस्र वर्षोंतक वनमे घोर तपस्या करके ब्रह्माजीसे वरदानके रूपमें शुक्राचार्यका सारा शिल्प-वैभव प्राप्त किया था॥ १२१/२ ॥

‘सम्पूर्ण कामनाओंके स्वामी बलवान् मयासुरने यहाँकी सारी वस्तुओंका निर्माण करके इस महान् वनमें कुछ कालतक सुखपूर्वक निवास किया था॥ १३१/२ ॥

‘आगे चलकर उस दानवराजका हेमा नामकी अप्सराके साथ सम्पर्क हो गया। यह जानकर देवेश्वर इन्द्रने हाथमें वज्र ले उसके साथ युद्ध करके उसे मार भगाया॥ १४१/२ ॥

‘तत्पश्चात् ब्रह्माजीने यह उत्तम वन, यहाँका अक्षय काम-भोग तथा यह सोनेका भवन हेमाको दे दिया॥

‘मैं मेरुसावर्णिकी कन्या हूँ। मेरा नाम स्वयंप्रभा है। वानरश्रेष्ठ! मैं उस हेमाके इस भवनकी रक्षा करती हूँ॥

‘नृत्य और गीतकी कलामें चतुर हेमा मेरी प्यारी सखी है। उसने मुझसे अपने भवनकी रक्षाके लिये प्रार्थना की थी, इसलिये मैं इस विशाल भवनका संरक्षण करती हूँ॥ १७१/२ ॥

‘तुमलोगोंका यहाँ क्या काम है? किस उद्देश्यसे तुम इन दुर्गम स्थानोंमें विचरते हो? इस वनमें आना तो बहुत कठिन है। तुमने कैसे इसे देख लिया?॥ १८१/२ ॥

‘अच्छा, ये शुद्ध भोजन और फल-मूल प्रस्तुत हैं। इन्हें खाकर पानी पी लो। फिर मुझसे अपना सारा वृत्तान्त कहो’॥ १९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें इक्यावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५१ ॥

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