श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतिरपनवाँ सर्ग
लौटनेकी अवधि बीत जानेपर भी कार्य सिद्ध न होनेके कारण सुग्रीवके कठोर दण्डसे डरनेवाले अङ्गद आदि वानरोंका उपवास करके प्राण त्याग देनेका निश्चय ६०१
तदनन्तर उन श्रेष्ठ वानरोंने वरुणकी निवासभूमि भयंकर महासागरको देखा, जिसका कहीं पार नहीं था और जो भयानक लहरोंसे व्याप्त होकर निरन्तर गर्जना कर रहा था॥ १ ॥
मयासुरके अपनी मायाद्वारा बनाये हुए पर्वतकी दुर्गम गुफामें सीताकी खोज करते हुए उन वानरोंका वह एक मास बीत गया, जिसे राजा सुग्रीवने लौटनेका समय निश्चित किया था॥ २ ॥
विन्ध्यगिरिके पार्श्ववर्ती पर्वतपर, जहाँके वृक्ष फूलोंसे लदे थे, बैठकर वे सभी महात्मा वानर चिन्ता करने लगे॥ ३ ॥
जो वसन्त-ऋतुमें फलते हैं, उन आम आदि वृक्षोंकी डालियोंको मञ्जरी एवं फूलोंके अधिक भारसे झुकी हुईं तथा सैकड़ों लता-वेलोंसे व्याप्त देख वे सभी सुग्रीवके भयसे थर्रा उठे (वे शरद्-ऋतुमें चले थे और शिशिर-ऋतु आ गयी थी। इसीलिये उनका भय बढ़ गया था)॥
वे एक-दूसरेको यह बताकर कि अब वसन्तका समय आना चाहता है, राजाके आदेशके अनुसार एक मासके भीतर जो काम कर लेना चाहिये था, वह न कर सकने या उसे नष्ट कर देनेके कारण भयके मारे पृथ्वीपर गिर पड़े॥ ५ ॥
तब जिनके कंधे सिंह और बैलके समान मांसल थे, भुजाएँ बड़ी-बड़ी और मोटी थीं तथा जो बड़े बुद्धिमान् थे, वे युवराज अङ्गद उन श्रेष्ठ वानरों तथा अन्य वनवासी कपियोंको यथावत् सम्मान देते हुए मधुर वाणीसे सम्बोधित करके बोले—॥ ६-७ ॥
‘वानरो! हम सब लोग वानरराजकी आज्ञासे आश्विन मास बीतते-बीतते एक मासकी निश्चित अवधि स्वीकार करके सीताकी खोजके लिये निकले थे, किंतु हमारा वह एक मास उस गुफामें ही पूरा हो गया, क्या आपलोग इस बातको नहीं जानते? हम जब चले थे, तबसे लौटनेके लिये जो मास निर्धारित हुआ था, वह भी बीत गया; अतः अब आगे क्या करना चाहिये?॥
‘आपलोगोंको राजाका विश्वास प्राप्त है। आप नीतिमार्गमें निपुण हैं और स्वामीके हितमें तत्पर रहते हैं। इसीलिये आपलोग यथासमय सब कार्योंमें नियुक्त किये जाते हैं॥ १० ॥