भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1351

‘जो पराक्रमका अवसर आनेपर विषादग्रस्त हो जाता है, उसके तेजका नाश होता है। उस तेजोहीन पुरुषका पुरुषार्थ नहीं सिद्ध होता है’॥ १०॥

उस रात्रिके बीत जानेपर बड़े-बड़े वानरोंके साथ मिलकर अङ्गदने पुनः विचार आरम्भ किया॥ ११॥

उस समय अङ्गदको घेरकर बैठी हुई वानरोंकी वह सेना इन्द्रको घेरकर स्थित हुई देवताओंकी विशाल वाहिनीके समान शोभा पाती थी॥ १२॥

वालिपुत्र अङ्गद तथा पवनकुमार हनुमान्जीको छोड़कर दूसरा कौन वीर उस वानरसेनाको सुस्थिर रख सकता था॥ १३॥

शत्रुवीरोंका दमन करनेवाले श्रीमान् अङ्गदने उन बड़े-बूढ़े वानरोंका सम्मान करके उनसे यह अर्थयुक्त बात कही— ॥ १४॥

‘सज्जनो! तुमलोगोंमें कौन ऐसा महातेजस्वी वीर है जो इस समय समुद्रको लाँघ जायगा और शत्रुदमन सुग्रीवको सत्यप्रतिज्ञ बनायेगा॥ १५॥

‘कौन वीर वानर सौ योजन समुद्रको लाँघ सकेगा? और कौन इन समस्त यूथपतियोंको महान् भयसे मुक्त कर देगा?॥ १६॥

‘किसके प्रसादसे हमलोग सफलमनोरथ एवं सुखी होकर यहाँसे लौटेंगे और घर-द्वार तथा स्त्री-पुत्रोंका मुँह देख सकेंगे॥ १७॥

‘किसके प्रसादसे हमलोग हर्षोत्फुल्ल होकर श्रीराम, महाबली लक्ष्मण तथा वानरवीर सुग्रीवके पास चल सकेंगे॥ १८॥

‘यदि तुमलोगोंमेंसे कोई वानरवीर समुद्रको लाँघ जानेमें समर्थ हो तो वह शीघ्र ही हमें यहाँ परम पवित्र अभय दान दे’॥ १९॥

अङ्गदकी यह बात सुनकर कोई कुछ नहीं बोला। वह सारी वानर-सेना वहाँ जडवत् स्थिर रही॥ २०॥

तब वानरश्रेष्ठ अङ्गदने पुनः उन सबसे कहा— ‘बलवानोंमें श्रेष्ठ वानरो! तुम सब लोग दृढ़तापूर्वक पराक्रम प्रकट करनेवाले हो। तुम्हारा जन्म कलङ्करहित उत्तम कुलमें हुआ है। इसके लिये तुम्हारी बारम्बार प्रशंसा हो चुकी है॥ २१॥