भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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छाछठवाँ सर्ग

जाम्बवान्‌का हनुमान्‌जीको उनकी उत्पत्तिकथा सुनाकर समुद्रलङ्घनके लिये उत्साहित करना

लाखों वानरोंकी सेनाको इस तरह विषादमें पड़ी देख जाम्बवान्‌ने हनुमान्‌जीसे कहा— ॥ १ ॥

‘वानरजगत्‌के वीर तथा सम्पूर्ण शास्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हनुमान्! तुम एकान्तमें आकर चुपचाप क्यों बैठे हो? कुछ बोलते क्यों नहीं?॥ २ ॥

‘हनूमन्! तुम तो वानरराज सुग्रीवके समान पराक्रमी हो तथा तेज और बलमें श्रीराम और लक्ष्मणके तुल्य हो॥ ३ ॥

‘कश्यपजीके महाबली पुत्र और समस्त पक्षियोंमें श्रेष्ठ जो विनतानन्दन गरुड़ हैं, उन्हींके समान तुम भी विख्यात शक्तिशाली एवं तीव्रगामी हो॥ ४ ॥

‘महाबली महाबाहु पक्षिराज गरुड़को मैंने समुद्रमें कँइ बार देखा है, जो बड़े-बड़े सर्पोंको वहाँसे निकाल लाते हैं॥ ५ ॥

‘उनके दोनों पंखोंमें जो बल है, वही बल, वही पराक्रम तुम्हारी इन दोनों भुजाओंमें भी है। इसीलिये तुम्हारा वेग और विक्रम भी उनसे कम नहीं है॥ ६ ॥

‘वानरशिरोमणे! तुम्हारा बल, बुद्धि, तेज और धैर्य भी समस्त प्राणियोंमें सबसे बढ़कर है। फिर तुम अपने-आपको ही समुद्र लाँघनेके लिये क्यों नहीं तैयार करते?॥ ७ ॥

‘(वीरवर! तुम्हारे प्रादुर्भावकी कथा इस प्रकार है—) पुञ्जिकस्थला नामसे विख्यात जो अप्सरा है, वह समस्त अप्सराओंमें अग्रगण्य है। तात! एक समय शापवश वह कपियोनिमें अवतीर्ण हुँइ। उस समय वह वानरराज महामनस्वी कुञ्जरकी पुत्री इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली थी। इस भूतलपर उसके रूपकी समानता करनेवाली दूसरी कोँइ स्त्री नहीं थी। वह तीनों लोकोंमें विख्यात थी। उसका नाम अञ्जना था। वह वानरराज केसरीकी पत्नी हुँइ॥ ८-९१/२ ॥

‘एक दिनकी बात है, रूप और यौवनसे सुशोभित होनेवाली अञ्जना मानवी स्त्रीका शरीर धारण करके वर्षाकालके मेघकी भाँति श्याम कान्तिवाले एक पर्वत-शिखरपर विचर रही थी।