भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1367

बड़े-बड़े गजराजोंसे भरे हुए उस पर्वतके समतल प्रदेशमें खड़े हुए कपिवर हनुमान्‌जी वहाँ जलाशयमें स्थित हुए विशालकाय हाथीके समान जान पड़ते थे॥

उन्होंने सूर्य, इन्द्र, पवन, ब्रह्मा और भूतों (देवयोनिविशेषों) को भी हाथ जोड़कर उस पार जानेका विचार किया॥ ८ ॥

फिर पूर्वाभिमुख होकर अपने पिता पवनदेवको प्रणाम किया। तत्पश्चात् कार्यकुशल हनुमान्‌जी दक्षिण दिशामें जानेके लिये बढ़ने लगे (अपने शरीरको बढ़ाने लगे)॥ ९ ॥

बड़े-बड़े वानरोंने देखा, जैसे पूर्णमाके दिन समुद्रमें ज्वार आने लगता है, उसी प्रकार समुद्र-लङ्घनके लिये दृढ़ निश्चय करनेवाले हनुमान्‌जी श्रीरामकी कार्य-सिद्धिके लिये बढ़ने लगे॥ १० ॥

समुद्रको लाँघनेकी इच्छासे उन्होंने अपने शरीरको बेहद बढ़ा लिया और अपनी दोनों भुजाओं तथा चरणोंसे उस पर्वतको दबाया॥ ११ ॥

कपिवर हनुमान्‌जीके द्वारा दबाये जानेपर तुरंत ही वह पर्वत काँप उठा और दो घड़ीतक डगमगाता रहा। उसके ऊपर जो वृक्ष उगे थे, उनकी डालियोंके अग्रभाग फूलोंसे लदे हुए थे; किंतु उस पर्वतके हिलनेसे उनके वे सारे फूल झड़ गये॥ १२ ॥

वृक्षोंसे झड़ी हुईं उस सुगन्धित पुष्पराशिके द्वारा सब ओरसे आच्छादित हुआ वह पर्वत ऐसा जान पड़ता था, मानो वह फूलोंका ही बना हुआ हो॥ १३ ॥

महापराक्रमी हनुमान्‌जीके द्वारा दबाया जाता हुआ महेन्द्रपर्वत जलके स्रोत बहाने लगा, मानो कोई मदमत्त गजराज अपने कुम्भस्थलसे मदकी धारा बहा रहा हो॥ १४ ॥

बलवान् पवनकुमारके भारसे दबा हुआ महेन्द्रगिरि सुनहरे, रुपहले और काले रंगके जलस्रोत प्रवाहित करने लगा॥ १५ ॥

इतना ही नहीं, जैसे मध्यम ज्वालासे युक्त अग्निरु लगातार धुआँ छोड़ रही हो, उसी प्रकार वह पर्वत मैनसिलसहित बड़ी-बड़ी शिलाएँ गिराने लगा॥ १६ ॥

हनुमान्‌जीके उस पर्वत-पीड़नसे पीड़ित होकर वहाँके समस्त जीव गुफाओंमें घुसे हुए बुरी तरहसे चिल्लाने लगे॥ १७ ॥

इस प्रकार पर्वतको दबानेके कारण उत्पन्न हुआ वह जीव-जन्तुओंका महान् कोलाहल पृथ्वी, उपवन और सम्पूर्ण दिशाओंमें भर गया॥ १८ ॥