श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1393, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंवानरश्रेष्ठ हनुमान्को देखते ही रावणपालित लंका स्वयं ही उठ खड़ी हुई। उसका मुँह देखनेमें बड़ा विकट था॥ २१ ॥
वह उन वीर पवनकुमारके सामने खड़ी हो गयी और बड़े जोरसे गर्जना करती हुई उनसे इस प्रकार बोली—॥ २२ ॥
‘वनचारी वानर! तू कौन है और किस कार्यसे यहाँ आया है ? तुम्हारे प्राण जबतक बने हुए हैं, तबतक ही यहाँ आनेका जो यथार्थ रहस्य है, उसे ठीक-ठीक बता दो॥ २३ ॥
‘वानर! रावणकी सेना सब ओरसे इस पुरीकी रक्षा करती है, अतः निश्चय ही तू इस लंकामें प्रवेश नहीं कर सकता’॥ २४ ॥
तब वीरवर हनुमान् अपने सामने खड़ी हुई लंकासे बोले—‘क्रूर स्वभाववाली नारी! तू मुझसे जो कुछ पूछ रही है, उसे मैं ठीक-ठीक बता दूँगा; किंतु पहले यह तो बता, तू है कौन? तेरी आँखें बड़ी भयंकर हैं। तू इस नगरके द्वारपर खड़ी है। क्या कारण है कि तू इस प्रकार क्रोध करके मुझे डाँट रही है’॥ २५-२६ ॥
हनुमान्जीकी यह बात सुनकर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली लंका कुपित हो उन पवनकुमारसे कठोर वाणीमें बोली—॥ २७ ॥
‘मैं महामना राक्षसराज रावणकी आज्ञाकी प्रतीक्षा करनेवाली उनकी सेविका हूँ। मुझपर आक्रमण करना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन है। मैं इस नगरीकी रक्षा करती हूँ॥ २८ ॥
‘मेरी अवहेलना करके इस पुरीमें प्रवेश करना किसीके लिये भी सम्भव नहीं है। आज मेरे हाथसे मारा जाकर तू प्राणहीन हो इस पृथ्वीपर शयन करेगा॥ २९ ॥
‘वानर! मैं स्वयं ही लंका नगरी हूँ, अतः सब ओरसे इसकी रक्षा करती हूँ। यही कारण है कि मैंने तेरे प्रति कठोर वाणीका प्रयोग किया है’॥ ३० ॥
लंकाकी यह बात सुनकर पवनकुमार कपिश्रेष्ठ हनुमान् उसे जीतनेके लिये यत्नशील हो दूसरे पर्वतके समान वहाँ खड़े हो गये॥ ३१ ॥
लंकाको विकराल राक्षसीके रूपमें देखकर बुद्धिमान् वानरशिरोमणि शक्तिशाली कपिश्रेष्ठ हनुमान्ने उससे इस प्रकार कहा—॥ ३२ ॥
‘मैं अट्टालिकाओं, परकोटों और नगरद्वारोंसहित इस लंका नगरीको देखूँगा। इसी प्रयोजनसे यहाँ आया हूँ। इसे देखनेके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है॥