श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 145, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंनवाँ सर्ग
सुमन्त्रका राजाको ऋष्यशृंग मुनिको बुलानेकी सलाह देते हुए उनके अंगदेशमें जाने और शान्तासे विवाह करनेका प्रसंग सुनाना
पुत्रके लिये अश्वमेध यज्ञ करनेकी बात सुनकर सुमन्त्रने राजासे एकान्तमें कहा—‘महाराज! एक पुराना इतिहास सुनिये। मैंने पुराणमें भी इसका वर्णन सुना है॥ १ ॥
‘ऋत्विजोंने पुत्र-प्राप्तिके लिये इस अश्वमेधरूप उपायका उपदेश किया है; परंतु मैंने इतिहासके रूपमें कुछ विशेष बात सुनी है। राजन्! पूर्वकालमें भगवान् सनत्कुमारने ऋषियोंके निकट एक कथा सुनायी थी। वह आपकी पुत्रप्राप्तिसे सम्बन्ध रखनेवाली है॥ २ १/२ ॥
‘उन्होंने कहा था, मुनिवरो! महर्षि काश्यपके विभाण्डक नामसे प्रसिद्ध एक पुत्र हैं। उनके भी एक पुत्र होगा, जिसकी लोगोंमें ऋष्यशृंग नामसे प्रसिद्धि होगी। वे ऋष्यशृंग मुनि सदा वनमें ही रहेंगे और वनमें ही सदा लालन-पालन पाकर वे बड़े होंगे॥ ३-४ ॥
‘सदा पिताके ही साथ रहनेके कारण विप्रवर ऋष्यशृंग दूसरे किसीको नहीं जानेंगे। राजन्! लोकमें ब्रह्मचर्यके दो रूप विख्यात हैं और ब्राह्मणोंने सदा उन दोनों स्वरूपोंका वर्णन किया है। एक तो है दण्ड, मेखला आदि धारणरूप मुख्य ब्रह्मचर्य और दूसरा है ऋतुकालमें पत्नी-समागमरूप गौण ब्रह्मचर्य। उन महात्माके द्वारा उक्त दोनों प्रकारके ब्रह्मचर्योंका पालन होगा॥ ५ १/२ ॥
“इस प्रकार रहते हुए मुनिका समय अग्नि तथा यशस्वी पिताकी सेवामें ही व्यतीत होगा॥ ६ १/२ ॥
“उसी समय अंगदेशमें रोमपाद नामक एक बड़े प्रतापी और बलवान् राजा होंगे; उनके द्वारा धर्मका उल्लङ्घन हो जानेके कारण उस देशमें घोर अनावृष्टि हो जायगी, जो सब लोगोंको अत्यन्त भयभीत कर देगी॥
“वर्षा बंद हो जानेसे राजा रोमपादको भी बहुत दुःख होगा। वे शास्त्रज्ञानमें बढ़े-चढ़े ब्राह्मणोंको बुलाकर कहेंगे—‘विप्रवरो! आपलोग वेद-शास्त्रके अनुसार कर्म करनेवाले तथा लोगोंके आचार-विचारको जाननेवाले हैं; अतः कृपा करके मुझे ऐसा कोई नियम बताइये, जिससे मेरे पापका प्रायश्चित्त हो जाय’॥ ९-१० १/२ ॥