भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 1465, कुल 2621 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1465

यद्यपि सदाचारी और सुशील कुलमें उनका जन्म हुआ था। फिर धार्मिक तथा उत्तम आचार-विचारवाले कुलमें वे ब्याही गयी थीं—विवाह-संस्कारसे सम्पन्न हुईं थीं, तथापि दूषित कुलमें उत्पन्न हुईं नारीके समान मलिन दिखायी देती थीं॥ १०॥

वे क्षीण हुईं विशाल कीर्ति, तिरस्कृत हुईं श्रद्धा, सर्वथा ह्रासको प्राप्त हुईं बुद्धि, टूटी हुईं आशा, नष्ट हुए भविष्य, उल्लङ्घित हुईं राजाज्ञा, उत्पातकालमें दहकती हुईं दिशा, नष्ट हुईं देवपूजा, चन्द्रग्रहणसे मलिन हुईं पूर्णमासीकी रात, तुषारपातसे जीर्ण-शीर्ण हुईं कमलिनी, जिसका शूरवीर सेनापति मारा गया हो—ऐसी सेना, अन्धकारसे नष्ट हुईं प्रभा, सूखी हुईं सरिता, अपवित्र प्राणियोंके स्पर्शसे अशुद्ध हुईं वेदी और बुझी हुईं अग्निशिखाके समान प्रतीत होती थीं॥ ११—१४॥

जिसे हाथीने अपनी सूँड़से हुँड़ेल डाला हो; अतएव जिसके पत्ते और कमल उखड़ गये हों तथा जलपक्षी भयसे थर्रा उठे हों, उस मथित एवं मलिन हुईं पुष्करिणीके समान सीता श्रीहीन दिखायी देती थीं॥ १५॥

पतिके विरह-शोकसे उनका हृदय बड़ा व्याकुल था। जिसका जल नहरोंके द्वारा इधर-उधर निकाल दिया गया हो, ऐसी नदीके समान वे सूख गयी थीं तथा उत्तम उबटन आदिके न लगनेसे कृष्णपक्षकी रात्रिके समान मलिन हो रही थीं॥ १६॥

उनके अंग बड़े सुकुमार और सुन्दर थे। वे रत्नजटित राजमहलमें रहनेके योग्य थीं; परंतु गर्मीसे तपी और तुरंत तोड़कर फेंकी हुईं कमलिनीके समान दयनीय दशाको पहुँच गयी थीं॥ १७॥

जिसे यूथपतिसे अलग करके पकड़कर खंभेमें बाँध दिया गया हो, उस हथिनीके समान वे अत्यन्त दुःखसे आतुर होकर लम्बी साँस खींच रही थीं॥ १८॥

बिना प्रयत्नके ही बँधी हुईं एक ही लम्बी वेणीसे सीताकी वैसी ही शोभा हो रही थी, जैसे वर्षा-ऋतु बीत जानेपर सुदूरतक फैली हुईं हरी-भरी वनश्रेणीसे पृथ्वी सुशोभित होती है॥ १९॥

वे उपवास, शोक, चिन्ता और भयसे अत्यन्त क्षीण, कृशकाय और दीन हो गयी थीं। उनका आहार बहुत कम हो गया था तथा एकमात्र तप ही उनका धन था॥

वे दुःखसे आतुर हो अपने कुलदेवतासे हाथ जोड़कर मन-ही-मन यह प्रार्थना-सी कर रही थीं कि श्रीरामचन्द्रजीके हाथसे दशमुख रावणकी पराजय हो॥