श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1480, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेईसवाँ सर्ग
राक्षसियोंका सीताजीको समझाना
शत्रुओंको रुलानेवाला राजा रावण सीताजीसे पूर्वोक्त बातें कहकर तथा सब राक्षसियोंको उन्हें वशमें लानेके लिये आदेश दे वहाँसे निकल गया॥ १ ॥
अशोकवाटिकासे निकलकर जब राक्षसराज रावण अन्तःपुरको चला गया, तब वहाँ जो भयानक रूपवाली राक्षसियाँ थीं, वे सब चारों ओरसे दौड़ी हुई सीताके पास आयीं॥ २ ॥
विदेहकुमारी सीताके समीप आकर क्रोधसे व्याकुल हुई उन राक्षसियोंने अत्यन्त कठोर वाणीद्वारा उनसे इस प्रकार कहना आरम्भ किया—॥ ३ ॥
‘सीते! तुम पुलस्त्यजीके कुलमें उत्पन्न हुए सर्वश्रेष्ठ दशग्रीव महामना रावणकी भार्या बनना भी कोई बहुत बड़ी बात नहीं समझती?’॥ ४ ॥
तत्पश्चात् एकजटा नामवाली राक्षसीने क्रोधसे लाल आँखें करके कृशोदरी सीताको पुकारकर कहा—॥ ५ ॥
‘विदेहकुमारी! पुलस्त्यजी छः* प्रजापतियोंमें चौथे हैं और ब्रह्माजीके मानस पुत्र हैं। इस रूपमें उनकी सर्वत्र ख्याति है॥ ६ ॥
‘पुलस्त्यजीके मानस पुत्र तेजस्वी महर्षि विश्रवा हैं। वे भी प्रजापतिके समान ही प्रकाशित होते हैं॥ ७ ॥
‘विशाललोचने! ये शत्रुओंके रुलानेवाले महाराज रावण उन्हींके पुत्र हैं और समस्त राक्षसोंके राजा हैं। तुम्हें इनकी भार्या हो जाना चाहिये। सर्वांगसुन्दरी! मेरी इस कही हुई बातका तुम अनुमोदन क्यों नहीं करतीं?’॥
इसके बाद बिल्लीके समान भूरे आँखोंवाली हरिजटा नामकी राक्षसीने क्रोधसे आँखें फाड़कर कहना आरम्भ किया—‘अरी! जिन्होंने तैंतीसों* देवताओं तथा देवराज इन्द्रको भी परास्त कर दिया है, उन राक्षसराज रावणकी रानी तो तुम्हें अवश्य बन जाना चाहिये॥
‘उन्हें अपने पराक्रमपर गर्व है। वे युद्धसे पीछे न हटनेवाले शूरवीर हैं। ऐसे बल-पराक्रमसम्पन्न पुरुषकी भार्या बनना तुम क्यों नहीं चाहती हो?॥ ११ ॥