श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनलकूबर बने और साम्ब विदूषक। इससे सिद्ध है कि भगवान् श्रीकृष्णके समयसे ही सफल रामलीला-कार्य आरम्भ था। यों तो ‘खेलौं तहाँ बालकन मीला। करौं सदा रघुनायक लीला॥’ से रामकथाकी तरह रामलीला आदिकी भी अनादिता सिद्ध है, तथापि इतिहासके विद्वानोंकी उत्सुकताके लिये इस घटनाका उल्लेख कर दिया गया। इसके बाद तो हनुमन्नाटक, प्रसन्नराघवनाटक, अनर्घराघवनाटक, महानाटक, बालरामायणनाटक आदि अगणित रामलीलानाटक ग्रन्थ ही लिख डाले गये। इन सभी नाटकग्रन्थोंका एकमात्र आधार यह वाल्मीकिरामायण ही रहा। इतना ही नहीं—इस वाल्मीकीय रामायण एवं रामकथाका प्रचार-विस्तार जावा, बाली आदि द्वीपोंतक हुआ। भारतमें इसके चार पाठ प्रचलित हैं। पश्चिमोत्तर शाखा (लाहौरका १९३१ का संस्करण), बंगशाखीय (Gorresio’s edition—गोरेशियोंका संस्करण), दाक्षिणात्य संस्करण, (गुजराती प्रिंटिङ्ग प्रेस बम्बईका तीन टीकावाला संस्करण तथा मध्वविलास बुकडिपो, कुम्भकोणमका संस्करण) एवं उत्तर भारतका संस्करण (काश्मीरी संस्करण)। इनमें दाक्षिणात्य तथा औदीच्य संस्करण तो सर्वथा एक ही है। इनमें कहीं नाममात्रका भी अन्तर नहीं है। पश्चिम-पूर्ववालोंमें अध्यायोंका अन्तर है। पर उनपर कोई संस्कृत टीका नहीं मिलती। बंगशाखीयपर केवल एक लोकनाथरचित मनोरमा टीका मिलती है। इसलिये दाक्षिणात्य संस्करण (औदीच्य भी वही है ही) का ही सर्वत्र प्रचार तथा प्रामाण्य है। गीताप्रेससे भी जनताकी बहुत दिनोंसे इसकी माँग थी। अतः इसी दाक्षिणात्य पाठका टिप्पणियों तथा चित्रोंसहित शुद्ध, सटीक एवं सस्ता संस्करण जनताकी सेवाके लिये प्रकाशित किया गया है। इसीके साथ एक सस्ता केवल मूलपाठका संस्करण भी प्रकाशित किया गया है। केवल हिंदी जाननेवालोंके लिये अलगसे केवल हिंदीका ही एक सस्ता संस्करण प्रकाशित किया जा रहा है। आशा है, सज्जनगण इनसे यथायोग्य लाभ उठायेंगे।
—जानकीनाथ शर्मा
१. (क) पठ रामायणं व्यास काव्यबीजं सनातनम्। यत्र रामचरित्रं स्यात् तदहं तत्र शक्तिमान्॥
(बृहद्धर्मपुराण, प्रथमखण्ड ३० । ४७, ५१)
(ख) रामायणं पाठितं मे प्रसन्नोऽस्मि कृतस्त्वया। करिष्यामि पुराणानि महाभारतमेव च॥
(बृहद्धर्मपुराण १ । ३० । ५५)
२. A curious Ms. is that of ‘Rāmāyaṇatātparyadīpikā which is said to have been an exposition of the meaning of the Rāmāyaṇa’ by Vyāsa at the request of Yudhistira.
(‘Studies in Rāmāyaṇa’, ‘Riddles of Rāmāyaṇa’ By K. S. Rāmaśāstrī, Book II, P.I.)
३. यह श्लोक इस प्रकार है—
अपि चायं पुरा गीतः श्लोको वाल्मीकिना भुवि। न हन्तव्याः स्त्रियश्चेति यद् ब्रवीषि प्लवंगम। ..........