भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पैंतीसवाँ सर्ग

सीताजीके पूछनेपर हनुमान्‌जीका श्रीरामके शारीरिक चिह्नों और गुणोंका वर्णन करना तथा नर-वानरकी मित्रताका प्रसङ्ग सुनाकर सीताजीके मनमें विश्वास उत्पन्न करना

वानरश्रेष्ठ हनुमान्‌जीके मुखसे श्रीरामचन्द्रजीकी चर्चा सुनकर विदेहराजकुमारी सीता शान्तिपूर्वक मधुर वाणीमें बोलीं— ॥ १ ॥

‘कपिवर! तुम्हारा श्रीरामचन्द्रजीके साथ सम्बन्ध कहाँ हुआ? तुम लक्ष्मणको कैसे जानते हो? मनुष्यों और वानरोंका यह मेल किस प्रकार सम्भव हुआ?॥ २ ॥

‘वानर! श्रीराम और लक्ष्मणके जो चिह्न हैं, उनका फिरसे वर्णन करो, जिससे मेरे मनमें किसी प्रकारके शोकका समावेश न हो॥ ३ ॥

‘मुझे बताओ भगवान् श्रीराम और लक्ष्मणकी आकृति कैसी है? उनका रूप किस तरहका है? उनकी जाँघें और भुजाएँ कैसी हैं?’॥ ४ ॥

विदेहराजकुमारी सीताके इस प्रकार पूछनेपर पवनकुमार हनुमान्‌जीने श्रीरामचन्द्रजीके स्वरूपका यथावत् वर्णन आरम्भ किया—॥ ५ ॥

‘कमलके समान सुन्दर नेत्रोंवाली विदेहराजकुमारी! आप अपने पतिदेव श्रीरामके तथा देवर लक्ष्मणजीके शरीरके विषयमें जानती हुई भी जो मुझसे पूछ रही हैं, यह मेरे लिये बड़े सौभाग्यकी बात है॥ ६ ॥

‘विशाललोचने! श्रीराम और लक्ष्मणके जिनजि न चिह्नोंको मैंने लक्ष्य किया है, उन्हें बताता हूँ। मुझसे सुनिये॥ ७ ॥

‘जनकनन्दिनि! श्रीरामचन्द्रजीके नेत्र प्रफुल्लकमल-दलके समान विशाल एवं सुन्दर हैं। मुख पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान मनोहर है। वे जन्मकालसे ही रूप और उदारता आदि गुणोंसे सम्पन्न हैं॥ ८ ॥

‘वे तेजमें सूर्यके समान, क्षमामें पृथ्वीके तुल्य, बुद्धिमें बृहस्पतिके सदृश और यशमें इन्द्रके समान हैं। वे सम्पूर्ण जीव-जगत्के तथा स्वजनोंके भी रक्षक हैं। शत्रुओंको संताप देनेवाले श्रीराम अपने सदाचार और धर्मकी रक्षा करते हैं॥ ९-१० ॥