श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1542, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ें‘इसी समय वह कौआ फिर वहाँ आया। मैं सोकर जगनेके बाद श्रीरघुनाथजीकी गोदसे उठकर बैठी ही थी कि उस कौएने सहसा झपटकर मेरी छातीमें चोंच मार दी॥ २२ ॥
‘उसने बारंबार उड़कर मुझे अत्यन्त घायल कर दिया। मेरे शरीरसे रक्तकी बूँदें झरने लगीं, इससे श्रीरामचन्द्रजीकी नींद खुल गयी और वे जागकर उठ बैठे॥ २३ ॥
‘मेरी छातीमें घाव हुआ देख महाबाहु श्रीराम उस समय कुपित हो उठे और फुफकारते हुए विषधर सर्पके समान जोर-जोरसे साँस लेते हुए बोले— ॥ २४ ॥
‘हाथीकी सूँड़के समान जाँघोंवाली सुन्दरी! किसने तुम्हारी छातीको क्षत-विक्षत किया है? कौन रोषसे भरे हुए पाँच मुखवाले सर्पके साथ खेल रहा है?’॥ २५ ॥
‘इतना कहकर जब उन्होंने इधर-उधर दृष्टि डाली, तब उस कौएको देखा, जो मेरी ओर ही मुँह किये बैठा था। उसके तीखे पंजे खूनसे रँग गये थे॥ २६ ॥
‘वह पक्षियोंमें श्रेष्ठ कौआ इन्द्रका पुत्र था। उसकी गति वायुके समान तीव्र थी। वह शीघ्र ही स्वर्गसे उड़कर पृथ्वीपर आ पहुँचा था॥ २७ ॥
‘उस समय बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ महाबाहु श्रीरामके नेत्र क्रोधसे घूमने लगे। उन्होंने उस कौएको कठोर दण्ड देनेका विचार किया॥ २८ ॥
‘श्रीरामने कुशकी चटाईसे एक कुश निकाला और उसे ब्रह्मास्त्रके मन्त्रसे अभिमन्त्रित किया। अभिमन्त्रित करते ही वह कालाग्निके समान प्रज्वलित हो उठा। उसका लक्ष्य वह पक्षी ही था॥ २९ ॥
‘श्रीरघुनाथजीने वह प्रज्वलित कुश उस कौएकी ओर छोड़ा। फिर तो वह आकाशमें उसका पीछा करने लगा॥ ३० ॥
‘वह कौआ कई प्रकारकी उड़ानें लगाता अपने प्राण बचानेके लिये इस सम्पूर्ण जगतमें भागता फिरा, किंतु उस बाणने कहीं भी उसका पीछा न छोड़ा॥ ३१ ॥
‘उसके पिता इन्द्र तथा समस्त श्रेष्ठ महर्षियोंने भी उसका परित्याग कर दिया। तीनों लोकोंमें घूमकर अन्तमें वह पुनः भगवान् श्रीरामकी ही शरणमें आया॥
‘रघुनाथजी शरणागतवत्सल हैं। उनकी शरणमें आकर जब वह पृथ्वीपर गिर पड़ा, तब उन्हें उसपर दया आ गयी; अतः वधके योग्य होनेपर भी उस कौएको उन्होंने मारा नहीं, उबारा॥ ३३ ॥