श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1561, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंहनुमान्जीकी इस गर्जनासे समस्त राक्षसोंपर भय एवं आतङ्क छा गया। उन सबने हनुमान्जीको देखा। वे संध्या-कालके ऊँचे मेघके समान लाल एवं विशालकाय दिखायी देते थे॥ ३७ ॥
हनुमान्जीने अपने स्वामीका नाम लेकर स्वयं ही अपना परिचय दे दिया था, इसलिये राक्षसोंको उन्हें पहचाननेमें कोर्इ संदेह नहीं रहा। वे नाना प्रकारके भयंकर अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार करते हुए चारों ओरसे उनपर टूट पड़े॥ ३८ ॥
उन शूरवीर राक्षसोंद्वारा सब ओरसे घिर जानेपर महाबली हनुमान्ने फाटकपर रखा हुआ एक भयंकर लोहेका परिघ उठा लिया॥ ३९ ॥
जैसे विनतानन्दन गरुड़ने छटपटाते हुए सर्पको पंजोंमें दाब रखा हो, उसी प्रकार उस परिघको हाथमें लेकर हनुमान्जीने उन निशाचरोंका संहार आरम्भ किया॥
वीर पवनकुमार उस परिघको लेकर आकाशमें विचरने लगे। जैसे सहस्रनेत्रधारी इन्द्र अपने वज्रसे दैत्योंका वध करते हैं, उसी प्रकार उन्होंने उस परिघसे सामने आये हुए समस्त राक्षसोंको मार डाला॥ ४१ ॥
उन किंकर नामधारी राक्षसोंका वध करके महावीर पवनपुत्र हनुमान्जी युद्धकी इच्छासे पुनः उस फाटकपर खड़े हो गये॥ ४२ ॥
तदनन्तर वहाँ उस भयसे मुक्त हुए कुछ राक्षसोंने जाकर रावणको यह समाचार निवेदन किया कि समस्त किंकर नामक राक्षस मार डाले गये॥ ४३ ॥
राक्षसोंकी उस विशाल सेनाको मारी गयी सुनकर राक्षसराज रावणकी आँखें चढ़ गयीं और उसने प्रहस्तके पुत्रको जिसके पराक्रमकी कहीं तुलना नहीं थी तथा युद्धमें जिसे परास्त करना नितान्त कठिन था, हनुमान्जीका सामना करनेके लिये भेजा॥ ४४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें बयालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४२ ॥