श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविदेहनन्दिनी सीताको नमस्कार करके वे चले और तीव्र गतिसे पुनः समुद्रके मध्यभागमें आ पहुँचे॥ ११-१२१/२ ॥
वहाँ पर्वतराज सुनाभ (मैनाक)-का स्पर्श करके वे पराक्रमी एवं महान् वेगशाली वानरवीर धनुषसे छूटे हुए बाणकी भाँति आगे बढ़ गये॥ १३१/२ ॥
उत्तर तटके कुछ निकट पहुँचनेपर महागिरि महेन्द्रपर दृष्टि पड़ते ही उन महाकपिने मेघके समान बड़े जोरसे गर्जना की॥ १४१/२ ॥
उस समय मेघकी भाँति गम्भीर स्वरसे बड़ी भारी गर्जना करके उन वानरवीरने सब ओरसे दसों दिशाओंको कोलाहलपूर्ण कर दिया॥ १५१/२ ॥
फिर वे अपने मित्रोंको देखनेके लिये उत्सुक होकर उनके विश्रामस्थानकी ओर बढ़े और पूँछ हिलाने एवं जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगे॥ १६१/२ ॥
जहाँ गरुड़ चलते हैं, उसी मार्गपर बारम्बार सिंहनाद करते हुए हनुमान्जीके गम्भीर घोषसे सूर्यमण्डलसहित आकाश मानो फटा जा रहा था॥ १७१/२ ॥
उस समय वायुपुत्र हनुमान्के दर्शनकी इच्छासे जो शूरवीर महाबली वानर समुद्रके उत्तर तटपर पहलेसे ही बैठे थे, उन्होंने वायुसे टकराये हुए महान् मेघकी गर्जनाके समान हनुमान्जीका जोर-जोरसे सिंहनाद सुना॥ १८-१९ ॥
अनिष्टकी आशङ्कासे जिनके मनमें दीनता छा गयी थी, उन समस्त वनवासी वानरोंने उन वानरश्रेष्ठ हनुमान्का मेघ-गर्जनाके समान सिंहनाद सुना॥ २० ॥
गर्जते हुए पवनकुमारका वह सिंहनाद सुनकर सब ओर बैठे हुए वे समस्त वानर अपने सुहृद् हनुमान्जीको देखनेकी अभिलाषासे उत्कण्ठित हो गये॥ २१ ॥
वानर-भालुओंमें श्रेष्ठ जाम्बवान्के मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। वे हर्षसे खिल उठे और सब वानरोंको निकट बुलाकर इस प्रकार बोले—॥ २२ ॥
‘इसमें संदेह नहीं कि हनुमान्जी सब प्रकारसे अपना कार्य सिद्ध करके आ रहे हैं। कृतकार्य हुए बिना इनकी ऐसी गर्जना नहीं हो सकती॥ २३ ॥
महात्मा हनुमान्जीकी भुजाओं और जाँघोंका महान् वेग देख तथा उनका सिंहनाद सुन सभी वानर हर्षमें भरकर इधर-उधर उछलने-कूदने लगे॥ २४ ॥