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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1630

‘मन्दोदरीका वह पुत्र युद्धकी कलामें बड़ा प्रवीण था। वह आकाशमें उड़ रहा था। उसी समय मैंने सहसा उसके दोनों पैर पकड़ लिये और सौ बार घुमाकर उसे पृथ्वीपर पटक दिया। इस तरह वहाँ पड़े हुए कुमार अक्षको मैंने पीस डाला॥ १२५-१२६ ॥

‘अक्षकुमार युद्धभूमिमें आया और मारा गया— यह सुनकर दशमुख रावणने अत्यन्त कुपित हो अपने दूसरे पुत्र इन्द्रजित्को, जो बड़ा ही रणदुर्मद और बलवान् था, भेजा॥ १२७ १/२ ॥

‘उसके साथ आयी हुईं सारी सेनाको और उस राक्षस-शिरोमणिको भी युद्धमें हतोत्साह करके मुझे बड़ा हर्ष हुआ॥ १२८ १/२ ॥

‘रावणने इस महाबली महाबाहु वीरको अनेक मदमत्त वीरोंके साथ बड़े विश्वाससे भेजा था॥ १२९ १/२ ॥

‘इन्द्रजित्ने देखा, मेरी सारी सेना कुचल डाली गयी, तब उसने समझ लिया कि इस वानरका सामना करना असम्भव है। अतः उसने बड़े वेगसे ब्रह्मास्त्र चलाकर मुझे बाँध लिया। फिर तो वहाँ राक्षसोंने मुझे रस्सियोंसे भी बाँधा॥ १३०-१३१ ॥

‘इस तरह मुझे पकड़कर वे सब रावणके समीप ले आये। दुरात्मा रावणने मुझे देखकर वार्तालाप आरम्भ किया और पूछा—‘तू लङ्कामें क्यों आया? तथा राक्षसोंका वध तूने क्यों किया ?’ मैंने वहाँ उत्तर दिया, ‘यह सब कुछ मैंने सीताजीके लिये किया है’॥ १३२-१३३ ॥

‘प्रभो! जनकनन्दिनीके दर्शनकी इच्छासे ही मैं तुम्हारे महलमें आया हूँ। मैं वायुदेवताका औरस पुत्र हूँ, जातिका वानर हूँ और हनुमान् मेरा नाम है। मुझे श्रीरामचन्द्रजीका दूत और सुग्रीवका मन्त्री समझो। श्रीरामचन्द्रजीका दूतकार्य करनेके लिये ही मैं यहाँ तुम्हारे पास आया हूँ॥ १३४-१३५ ॥

‘तुम मेरे स्वामीका संदेश, जो मैं तुम्हें बता रहा हूँ, सुनो। राक्षसराज! वानरराज सुग्रीवने तुमसे एकाग्रतापूर्वक जो बात कही है, उसपर ध्यान दो॥ १३६ ॥

‘महाभाग सुग्रीवने तुम्हारी कुशल पूछी है और तुम्हें सुनानेके लिये यह धर्म, अर्थ एवं कामसे युक्त हितकर तथा लाभदायक बात कही है—॥ १३७ ॥

‘जब मैं बहुसंख्यक वृक्षोंसे हरे-भरे ऋष्यमूक पर्वतपर निवास करता था, उन दिनों रणमें महान् पराक्रम प्रकट करनेवाले रघुनाथजीने मेरे साथ मित्रता स्थापित की थी॥ १३८ ॥