श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवे वानरगण जब ऐसी बातें कहने लगे, तब अङ्गद बोले—‘बहुत अच्छा, अब हमलोग चलें।’ इतना कहकर वे महाबली वानर आकाशमें उड़ चले॥ २३ ॥
आगे-आगे अङ्गद और उनके पीछे वे समस्त वानरयूथपति उड़ने लगे। वे आकाशको आच्छादित करके गुलेलसे फेंके गये पत्थरोंकी भाँति तीव्रगतिसे जा रहे थे॥ २४ ॥
अङ्गद और वानरवीर हनुमान्को आगे करके सभी वेगवान् वानर सहसा आकाशमें उछलकर वायुसे उड़ाये गये बादलोंकी भाँति बड़े जोर-जोरसे गर्जना करते हुए किष्किन्धाके निकट जा पहुँचे॥ २५ १/२ ॥
अङ्गदके निकट पहुँचते ही वानरराज सुग्रीवने शोकसंतप्त कमलनयन श्रीरामसे कहा—॥ २६ १/२ ॥
‘प्रभो! धैर्य धारण कीजिये। आपका कल्याण हो। सीता देवीका पता लग गया है, इसमें संशय नहीं है; क्योंकि कृतकार्य हुए बिना दिये हुए समयकी अवधिको बिताकर ये वानर कदापि यहाँ नहीं आ सकते थे॥
‘शुभदर्शन श्रीराम! अङ्गदकी अत्यन्त प्रसन्नतासे भी मुझे इसी बातकी सूचना मिल रही है। यदि काम बिगाड़ दिया गया होता तो वानरोंमें श्रेष्ठ युवराज महाबाहु अङ्गद मेरे पास कदापि लौटकर नहीं आते॥ २८-२९ ॥
‘यद्यपि कार्य सिद्ध न होनेपर भी इस तरह लोगोंका अपने घर लौटना देखा गया है, तथापि उस दशामें अङ्गदके मुखपर उदासी छायी होती और उनके चित्तमें घबराहटके कारण उथल-पुथल मची होती॥ ३० ॥
‘मेरे बाप-दादोंके इस मधुवनका, जिसकी पूर्वजोंने भी सदा रक्षा की है, कोई जनककिशोरीका दर्शन किये बिना विध्वंस नहीं कर सकता था॥ ३१ ॥
‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाले श्रीराम! आपको पाकर माता कौसल्या उत्तम संतानकी जननी हुई हैं। आप धैर्य धारण कीजिये। इसमें कोई संदेह नहीं कि देवी सीताका दर्शन हो गया। किसी औरने नहीं, हनुमान्जीने ही उनका दर्शन किया है॥ ३२ ॥
‘मतिमानोंमें श्रेष्ठ रघुनन्दन! इस कार्यको सिद्ध करनेमें हनुमान्जीके सिवा और कोई कारण बना हो, ऐसा सम्भव नहीं है। वानरशिरोमणि हनुमान्में ही कार्यसिद्धिकी शक्ति और बुद्धि है। उन्हींमें उद्योग, पराक्रम और शास्त्रज्ञान भी प्रतिष्ठित है। जिस दलके नेता जाम्बवान् और