भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1682

इस प्रकार वह विशाल वानरसेना दिन-रात चलती रही। सुग्रीवसे सुरक्षित सभी वानर हृष्ट-पुष्ट और प्रसन्न थे। सभी बड़ी उतावलीके साथ चल रहे थे। सभी युद्धका अभिनन्दन करनेवाले थे और सभी सीताजीको रावणकी कैदसे छुड़ाना चाहते थे। इसलिये उन्होंने रास्तेमें कहीं दो घड़ी भी विश्राम नहीं लिया॥

चलते-चलते घने वृक्षोंसे व्याप्त और अनेकानेक काननोंसे संयुक्त सह्य पर्वतके पास पहुँचकर वे सब वानर उसके ऊपर चढ़ गये॥ ७० ॥

श्रीरामचन्द्रजी सह्य और मलयके विचित्र काननों, नदियों तथा झरनोंकी शोभा देखते हुए यात्रा कर रहे थे॥

वे वानर मार्गमें मिले हुए चम्पा, तिलक, आम, अशोक, सिन्दुवार, तिनिश और करवीर आदि वृक्षोंको तोड़ देते थे॥ ७२ ॥

उछल-उछलकर चलनेवाले वे वानरसैनिक रास्तेके अंकोल, करंज, पाकड़, बरगद, जामुन, आँवले और नीप आदि वृक्षोंको भी तोड़ डालते थे॥ ७३ ॥

रमणीय पत्थरोंपर उगे हुए नाना प्रकारके जंगली वृक्ष वायुके झोंकेसे झूम-झूमकर उन वानरोंपर फूलोंकी वर्षा करते थे॥ ७४ ॥

मधुसे सुगन्धित वनोंमें गुनगुनाते हुए भौरोंके साथ चन्दनके समान शीतल, मन्द, सुगन्ध वायु चल रही थी॥ ७५ ॥

वह पर्वतराज गैरिक आदि धातुओंसे विभूषित हो बड़ी शोभा पा रहा था। उन धातुओंसे फैली हुई धूल वायुके वेगसे उड़कर उस विशाल वानरसेनाको सब ओरसे आच्छादित कर देती थी॥ ७६ १/२ ॥

रमणीय पर्वतशिखरोंपर सब ओर खिली हुई केतकी, सिन्दुवार और वासन्ती लताएँ बड़ी मनोरम जान पड़ती थीं। प्रफुल्ल माधवी लताएँ सुगन्धसे भरी थीं और कुन्दकी झाड़ियाँ भी फूलोंसे लदी हुई थीं॥ ७७-७८ ॥

चिरिबिल्व, मधूक (महुआ), वञ्जुल, बकुल, रंजक, तिलक और नागकेसरके वृक्ष भी वहाँ खिले हुए थे॥

आम, पाडर और कोविदार भी फूलोंसे लदे थे। मुचुलिन्द, अर्जुन, शिंशपा, कुटज, हिंताल, तिनिश, चूर्णक, कदम्ब, नीलाशोक, सरल, अंकोल और पद्मक भी सुन्दर फूलोंसे सुशोभित थे॥