श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1684, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंउस पर्वतसे उतरकर भक्तोंके मनको रमानेवालोंमें श्रेष्ठ भगवान् श्रीराम सुग्रीव और लक्ष्मणके साथ शीघ्र ही सागर-तटवर्ती परम उत्तम वनमें जा पहुँचे॥ ९५॥
जहाँ सहसा उठी हुई जलकी तरङ्गोंसे प्रस्तरकी शिलाएँ धुल गयी थीं, उस विस्तृत सिन्धुतटपर पहुँचकर श्रीरामने कहा— ॥ ९६॥
‘सुग्रीव! लो, हम सब लोग समुद्रके किनारे तो आ गये। अब यहाँ मनमें फिर वही चिन्ता उत्पन्न हो गयी, जो हमारे सामने पहले उपस्थित थी॥ ९७॥
‘इससे आगे तो यह सरिताओंका स्वामी महासागर ही विद्यमान है, जिसका कहीं पार नहीं दिखायी देता। अब बिना किसी समुचित उपायके सागरको पार करना असम्भव है॥ ९८॥
‘इसलिये यहीं सेनाका पड़ाव पड़ जाय और हमलोग यहाँ बैठकर यह विचार आरम्भ करें कि किस प्रकार यह वानर-सेना समुद्रके उस पारतक पहुँच सकती है’॥ ९९॥
इस प्रकार सीताहरणके शोकसे दुर्बल हुए महाबाहु श्रीरामने समुद्रके किनारे पहुँचकर उस समय सारी सेनाको वहाँ ठहरनेकी आज्ञा दी॥ १००॥
वे बोले—‘कपिश्रेष्ठ! समस्त सेनाओंको समुद्रके तटपर ठहराया जाय। अब यहाँ हमारे लिये समुद्र-लङ्घनके उपायपर विचार करनेका अवसर प्राप्त हुआ है॥ १०१॥
‘इस समय कोई भी सेनापति किसी भी कारणसे अपनी-अपनी सेनाको छोड़कर कहीं अन्यत्र न जाय। समस्त शूरवीर वानर-सेनाकी रक्षाके लिये यथास्थान चले जायें। सबको यह जान लेना चाहिये कि हमलोगोंपर राक्षसोंकी मायासे गुप्त भय आ सकता है’॥ १०२॥
श्रीरामचन्द्रजीका यह वचन सुनकर लक्ष्मणसहित सुग्रीवने वृक्षावलियोंसे सुशोभित सागर-तटपर सेनाको ठहरा दिया॥ १०३॥
समुद्रके पास ठहरी हुई वह विशाल वानर-सेना मधुके समान पिङ्गलवर्णके जलसे भरे हुए दूसरे सागरकी-सी शोभा धारण करती थी॥ १०४॥
सागर-तटवर्ती वनमें पहुँचकर वे सभी श्रेष्ठ वानर समुद्रके उस पार जानेकी अभिलाषा मनमें लिये वहीं ठहर गये॥ १०५॥
वहाँ डेरा डालते हुए उन श्रीराम आदिकी सेनाओंके संचरणसे जो महान् कोलाहल हुआ, वह महासागरकी गम्भीर गर्जनाको भी दबाकर सुनायी देने लगा॥ १०६॥