भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1687

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पाँचवाँ सर्ग

श्रीरामका सीताके लिये शोक और विलाप

नीलने, जिसकी विधिवत् रक्षाकी व्यवस्था की गयी थी, उस परम सावधान वानर-सेनाको समुद्रके उत्तर तटपर अच्छे ढंगसे ठहराया॥ १ ॥

मैन्द और द्विविद—ये दो प्रमुख वानरवीर उस सेनाकी रक्षाके लिये सब ओर विचरते रहते थे॥ २ ॥

समुद्रके किनारे सेनाका पड़ाव पड़ जानेपर श्रीरामचन्द्रजीने अपने पास बैठे हुए लक्ष्मणकी ओर देखकर कहा— ॥ ३ ॥

‘सुमित्रानन्दन! कहा जाता है कि शोक बीतते हुए समयके साथ स्वयं भी दूर हो जाता है; परंतु मेरा शोक तो अपनी प्राणवल्लभाको न देखनेके कारण दिनोंदिन बढ़ रहा है॥ ४ ॥

‘मुझे इस बातका दुःख नहीं है कि मेरी प्रिया मुझसे दूर है। उसका अपहरण हुआ—इसका भी दुःख नहीं है। मैं तो बारंबार इसीलिये शोकमें डूबा रहता हूँ कि उसके जीवित रहनेके लिये जो अवधि नियत कर दी गयी है, वह शीघ्रतापूर्वक बीती जा रही है॥ ५ ॥

‘हवा! तुम वहाँ बह, जहाँ मेरी प्राणवल्लभा है। उसका स्पर्श करके मेरा भी स्पर्श कर। उस दशामें तुझसे जो मेरे अङ्गोंका स्पर्श होगा, वह चन्द्रमासे होनेवाले दृष्टिसंयोगकी भाँति मेरे सारे संतापको दूर करनेवाला और आह्लादजनक होगा॥ ६ ॥

‘अपहरण होते समय मेरी प्यारी सीताने जो मुझे ‘हा नाथ!’ कहकर पुकारा था, वह पीये हुए उदरस्थित विषकी भाँति मेरे सारे अङ्गोंको दग्ध किये देता है॥

‘प्रियतमाका वियोग ही जिसका ऽंइंधन है, उसकी चिन्ता ही जिसकी दीप्तिमती लपटें हैं, वह प्रेमाग्नि मेरे शरीरको रात-दिन जलाती रहती है॥ ८ ॥

‘सुमित्रानन्दन! तुम यहीं रहो। मैं तुम्हारे बिना अकेला ही समुद्रके भीतर घुसकर सोऊँगा। इस तरह जलमें शयन करनेपर यह प्रज्वलित प्रेमाग्नि मुझे दग्ध नहीं कर सकेगी॥ ९ ॥

‘मैं और वह वामोरु सीता एक ही भूतलपर सोते हैं। प्रियतमाके संयोगकी इच्छा रखनेवाले मुझ विरहीके लिये इतना ही बहुत है। इतनेसे भी मैं जीवित रह सकता हूँ॥ १० ॥