श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1690, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंछठा सर्ग
रावणका कर्तव्य-निर्णयके लिये अपने मन्त्रियोंसे समुचित सलाह देनेका अनुरोध करना
इधर इन्द्रतुल्य पराक्रमी महा त्मा हनुमान्जीने लङ्कामें जो अत्यन्त भयावह घोर कर्म किया था, उसे देखकर राक्षसराज रावणका मुख लज्जासे कुछ नीचेको झुक गया और उसने समस्त राक्षसोंसे इस प्रकार कहा— ॥
‘निशाचरो! वह हनुमान्, जो एक वानरमात्र है, अकेला इस दुर्धर्ष पुरीमें घुस आया। उसने इसे तहस-नहस कर डाला और जनककुमारी सीतासे भेंट भी कर लिया॥ २ ॥
‘इतना ही नहीं, हनुमान्ने चैत्यप्रासादको धराशायी कर दिया, मुख्य-मुख्य राक्षसोंको मार गिराया और सारी लङ्कापुरीमें खलबली मचा दी॥ ३ ॥
‘तुमलोगोंका भला हो। अब मैं क्या करूँ? तुम्हें जो कार्य उचित और समर्थ जान पड़े तथा जिसे करनेपर कोर्इ अच्छा परिणाम निकले, उसे बताओ॥ ४ ॥
‘महाबली वीरो! मनस्वी पुरुषोंका कहना है कि विजयका मूल कारण मन्त्रियोंकी दी हुर्इ अच्छी सलाह ही है। इसलिये मैं श्रीरामके विषयमें आपलोगोंसे सलाह लेना अच्छा समझता हूँ॥ ५ ॥
‘संसारमें उत्तम, मध्यम और अधम तीन प्रकारके पुरुष होते हैं। मैं उन सबके गुण-दोषोंका वर्णन करता हूँ॥ ६ ॥
‘जिसका मन्त्र आगे बताये जानेवाले तीन लक्षणोंसे युक्त होता है तथा जो पुरुष मन्त्रनिर्णयमें समर्थ मित्रों, समान दुःख-सुखवाले बान्धवों और उनसे भी बढ़कर अपने हितकारियोंके साथ सलाह करके कार्यका आरम्भ करता है तथा दैवके सहारे प्रयत्न करता है, उसे उत्तम पुरुष कहते हैं॥ ७-८ ॥
‘जो अकेला ही अपने कर्तव्यका विचार करता है, अकेला ही धर्ममें मन लगाता है और अकेला ही सब काम करता है, उसे मध्यम श्रेणीका पुरुष कहा जाता है॥ ९ ॥
‘जो गुण-दोषका विचार न करके दैवका भी आश्रय छोड़कर केवल ‘करूँगा’ इसी बुद्धिसे कार्य आरम्भ करता है और फिर उसकी उपेक्षा कर देता है, वह पुरुषोंमें अधम है॥ १० ॥