भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1704

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ग्यारहवाँ सर्ग

रावण और उसके सभासदोंका सभाभवनमें एकत्र होना

राक्षसोंका राजा रावण मिथिलेशकुमारी सीताके प्रति कामसे मोहित हो रहा था, उसके हितैषी सुहृद् विभीषण आदि उसका अनादर करने लगे थे—उसके कुकृत्योंकी निन्दा करते थे तथा वह सीताहरणरूपी जघन्य पाप-कर्मके कारण पापी घोषित किया गया था—इन सब कारणोंसे वह अत्यन्त कृश (चिन्तायुक्त एवं दुर्बल) हो गया था॥ १ ॥

वह अत्यन्त कामसे पीड़ित होकर बारंबार विदेहकुमारीका चिन्तन करता था, इसलिये युद्धका अवसर बीत जानेपर भी उसने उस समय मन्त्रियों और सुहृदोंके साथ सलाह करके युद्धको ही समयोचित कर्तव्य माना॥ २ ॥

वह सोनेकी जालीसे आच्छादित तथा मणि एवं मूँगोंसे विभूषित एक विशाल रथपर, जिसमें सुशिक्षित घोड़े जुते हुए थे; जा चढ़ा॥ ३ ॥

महान् मेघोंकी गर्जनाके समान घर्घर्राहट पैदा करनेवाले उस उत्तम रथपर आरूढ़ हो राक्षसशिरोमणि दशग्रीव सभाभवनकी ओर प्रस्थित हुआ॥ ४ ॥

उस समय राक्षसराज रावणके आगे-आगे ढाल-तलवार एवं सब प्रकारके आयुध धारण करनेवाले बहुसंख्यक राक्षस योद्धा जा रहे थे॥ ५ ॥

इसी तरह भाँति-भाँतिके आभूषणोंसे विभूषित और नाना प्रकारके विकराल वेषवाले अगणित निशाचर उसे दायें-बायें और पीछेकी ओरसे घेरकर चल रहे थे॥ ६ ॥

रावणके प्रस्थान करते ही बहुत-से अतिरथी वीर रथों, मतवाले गजराजों और खेल-खेलमें तरह-तरहकी चालें दिखानेवाले घोड़ोंपर सवार हो तुरंत उसके पीछे चल दिये॥ ७ ॥

किन्हींके हाथोंमें गदा और परिघ शोभा पा रहे थे। कोई शक्ति और तोमर लिये हुए थे। कुछ लोगोंने फरसे धारण कर रखे थे तथा अन्य राक्षसोंके हाथोंमें शूल चमक रहे थे, फिर तो वहाँ सहस्रों वाद्योंका महान् घोष होने लगा॥ ८ ॥

रावणके सभाभवनकी ओर यात्रा करते समय तुमुल शङ्खध्वनि होने लगी। उसका वह विशाल रथ अपने पहियोंकी घर्घर्राहटसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करता हुआ सहसा शोभाशाली राजमार्गपर जा पहुँचा॥ ९ १/२ ॥