भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 1722, कुल 2621 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1722

‘तुम समस्त प्राणियोंका संहार करनेवाले कालके पाशमें बँध चुके हो। जिसमें आग लग गयी हो, उस घरकी भाँति नष्ट हो रहे हो। ऐसी दशामें मैं तुम्हारी उपेक्षा नहीं कर सकता था, इसीलिये तुम्हें हितकी बात सुझा दी थी॥ २२ ॥

‘श्रीरामके सुवर्णभूषित बाण प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी और तीखे हैं। मैं श्रीरामके द्वारा उन बाणोंसे तुम्हारी मृत्यु नहीं देखना चाहता था, इसीलिये तुम्हें समझानेकी चेष्टा की थी॥ २३ ॥

‘कालके वशीभूत होनेपर बड़े-बड़े शूरवीर, बलवान् और अस्त्रवेत्ता भी बालूकी भीति या बाँधके समान नष्ट हो जाते हैं॥ २४ ॥

‘राक्षसराज! मैं तुम्हारा हित चाहता हूँ। इसीलिये जो कुछ भी कहा है, वह यदि तुम्हें अच्छा नहीं लगा तो उसके लिये मुझे क्षमा कर दो; क्योंकि तुम मेरे बड़े भाई हो। अब तुम अपनी तथा राक्षसोंसहित इस समस्त लङ्कापुरीकी सब प्रकारसे रक्षा करो। तुम्हारा कल्याण हो। अब मैं यहाँसे चला जाऊँगा। तुम मेरे बिना सुखी हो जाओ॥ २५ ॥

‘निशाचरराज! मैं तुम्हारा हितैषी हूँ। इसीलिये मैंने तुम्हें बार-बार अनुचित मार्गपर चलनेसे रोका है, किंतु तुम्हें मेरी बात अच्छी नहीं लगती है। वास्तवमें जिन लोगोंकी आयु समाप्त हो जाती है, वे जीवनके अन्तकालमें अपने सुहृदोंकी कही हुई हितकर बात भी नहीं मानते हैं’॥ २६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें सोलहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १६ ॥