श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1725, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ें॥
‘सम्भव है यह राक्षसराज रावणका कोई गुप्तचर हो। यदि ऐसा हुआ तो हमलोगोंमें घुसकर यह फूट पैदा कर देगा, इसमें संदेह नहीं॥ २२ ॥
‘अथवा यह बुद्धिमान् राक्षस छिद्र पाकर हमारी विश्वस्त सेनाके भीतर घुसकर कभी स्वयं ही हमलोगोंपर प्रहार कर बैठेगा, इस बातकी भी सम्भावना है॥ २३ ॥
‘मित्रोंकी, जंगली जातियोंकी तथा परम्परागत भृत्योंकी जो सेनाएँ हैं, इन सबका संग्रह तो किया जा सकता है; किंतु जो शत्रुपक्षसे मिले हुए हों, ऐसे सैनिकोंका संग्रह कदापि नहीं करना चाहिये॥ २४ ॥
‘प्रभो! यह स्वभावसे तो राक्षस है ही, अपनेको शत्रुता भाई भी बता रहा है। इस दृष्टिसे यह साक्षात् हमारा शत्रु ही यहाँ आ पहुँचा है; फिर इसपर कैसे विश्वास किया जा सकता है॥ २५ ॥
‘रावणका छोटा भाई, जो विभीषणके नामसे प्रसिद्ध है, चार राक्षसोंके साथ आपकी शरणमें आया है॥ २६ ॥
‘आप उस विभीषणको रावणका भेजा हुआ ही समझें। उचित व्यापार करनेवालोंमें श्रेष्ठ रघुनन्दन! मैं तो उसको कैद कर लेना ही उचित समझता हूँ॥ २७ ॥
‘निष्पाप श्रीराम! मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि यह राक्षस रावणके कहनेसे ही यहाँ आया है। इसकी बुद्धिमें कुटिलता भरी है। यह मायासे छिपा रहेगा तथा जब आप इसपर पूरा विश्वास करके इसकी ओरसे निश्चिन्त हो जायँगे, तब यह आपहीपर चोट कर बैठेगा। इसी उद्देश्यसे इसका यहाँ आना हुआ है॥ २८ ॥
‘यह महाक्रूर रावणका भाई है, इसलिये इसे कठोर दण्ड देकर इसके मन्त्रियोंसहित मार डालना चाहिये’॥ २९ ॥
बातचीतकी कला जाननेवाले एवं रोषमें भरे हुए सेनापति सुग्रीव प्रवचनकुशल श्रीरामसे ऐसी बातें कहकर चुप हो गये॥ ३० ॥
सुग्रीवका वह वचन सुनकर महाबली श्रीराम अपने निकट बैठे हुए हनुमान् आदि वानरोंसे इस प्रकार बोले—॥ ३१ ॥