श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1736, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंविभीषणके ऐसा कहनेपर भगवान् श्रीरामने उन्हें हृदयसे लगा लिया और प्रसन्न होकर लक्ष्मणसे कहा— 'दूसरोंको मान देनेवाले सुमित्रानन्दन! तुम समुद्रसे जल ले आओ और उसके द्वारा इन परम बुद्धिमान् राक्षसराज विभीषणका लङ्काके राज्यपर शीघ्र ही अभिषेक कर दो। मेरे प्रसन्न होनेपर इन्हें यह लाभ मिलना ही चाहिये'॥ २४-२५ ॥
उनके ऐसा कहनेपर सुमित्राकुमार लक्ष्मणने मुख्य-मुख्य वानरोंके बीच महाराज श्रीरामके आदेशसे विभीषणका राक्षसोंके राजाके पदपर अभिषेक कर दिया॥ २६ ॥
भगवान् श्रीरामका यह तात्कालिक प्रसाद (अनुग्रह) देखकर सब वानर हर्षध्वनि करने और महात्मा श्रीरामको साधुवाद देने लगे॥ २७ ॥
तत्पश्चात् हनुमान् और सुग्रीवने विभीषणसे पूछा— 'राक्षसराज! हम सब लोग इस अक्षोभ्य समुद्रको महाबली वानरोंकी सेनाओंके साथ किस प्रकार पार कर सकेंगे? 'जिस उपायसे हम सब लोग सेनासहित नदों और नदियोंके स्वामी वरुणालय समुद्रके पार जा सकें, वह बताओ'॥ २९ ॥
उनके इस प्रकार पूछनेपर धर्मात्मा विभीषणने यों उत्तर दिया— 'रघुवंशी राजा श्रीरामको समुद्रकी शरण लेनी चाहिये॥ ३० ॥
'इस अपार महासागरको राजा सगरने खुदवाया था। श्रीरामचन्द्रजी सगरके वंशज हैं। इसलिये समुद्रको इनका काम अवश्य करना चाहिये'॥ ३१ ॥
विद्वान् राक्षस विभीषणके ऐसा कहनेपर सुग्रीव उस स्थानपर आये, जहाँ लक्ष्मणसहित श्रीराम विद्यमान थे॥ ३२ ॥
वहाँ विशाल ग्रीवावाले सुग्रीवने समुद्रपर धरना देनेके विषयमें जो विभीषणका शुभ वचन था, उसे कहना आरम्भ किया॥ ३३ ॥
भगवान् श्रीराम स्वभावसे ही धर्मशील थे, अतः उन्हें भी विभीषणकी यह बात अच्छी लगी। वे महातेजस्वी रघुनाथजी लक्ष्मणसहित कार्यदक्ष वानरराज सुग्रीवका सत्कार करते हुए उनसे मुसकराकर बोले—॥ ३४१/२ ॥
'लक्ष्मण! विभीषणकी यह सम्मति मुझे भी अच्छी लगती है; परंतु सुग्रीव राजनीतिके बड़े पण्डित हैं और तुम भी समयोचित सलाह देनेमें सदा ही कुशल हो। इसलिये तुम दोनों प्रस्तुत कार्यपर अच्छी तरह विचार करके जो ठीक जान पड़े, वह बताओ'॥ ३५-३६ ॥