श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 179, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंवे विष्णुस्वरूप हविष्य या खीरके आधे भागसे प्रकट हुए थे। कौसल्याके महाभाग पुत्र श्रीराम इक्ष्वाकुकुलका आनन्द बढ़ानेवाले थे। उनके नेत्रोंमें कुछ-कुछ लालिमा थी। उनके ओठ लाल, भुजाएँ बड़ी-बड़ी और स्वर दुन्दुभिके शब्दके समान गम्भीर था॥ ११॥
उस अमिततेजस्वी पुत्रसे महारानी कौसल्याकी बड़ी शोभा हुई, ठीक उसी तरह, जैसे सुरश्रेष्ठ वज्रपाणि इन्द्रसे देवमाता अदिति सुशोभित हुई थीं॥ १२ ॥
तदनन्तर कैकेयीसे सत्यपराक्रमी भरतका जन्म हुआ, जो साक्षात् भगवान् विष्णुके (स्वरूपभूत पायस— खीरके) चतुर्थांशसे भी न्यून भागसे प्रकट हुए थे। ये समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न थे॥ १३ ॥
इसके बाद रानी सुमित्राने लक्ष्मण और शत्रुघ्न—इन दो पुत्रोंको जन्म दिया। ये दोनों वीर साक्षात् भगवान् विष्णुके अर्धभागसे सम्पन्न और सब प्रकारके अस्त्रोंकी विद्यामें कुशल थे॥ १४ ॥
भरत सदा प्रसन्नचित्त रहते थे। उनका जन्म पुष्य नक्षत्र तथा मीन लग्नमें हुआ था। सुमित्राके दोनों पुत्र आश्लेषा नक्षत्र और कर्कलग्नमें उत्पन्न हुए थे। उस समय सूर्य अपने उच्च स्थानमें विराजमान थे॥ १५ ॥
राजा दशरथके ये चारों महामनस्वी पुत्र पृथक्-पृथक् गुणोंसे सम्पन्न और सुन्दर थे। ये भाद्रपदा नामक चार तारोंके समान कान्तिमान् थे१॥ १६ ॥
इनके जन्मके समय गन्धर्वोंने मधुर गीत गाये। अप्सराओंने नृत्य किया। देवताओंकी दुन्दुभियाँ बजने लगीं तथा आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी॥ १७ ॥
अयोध्यामें बहुत बड़ा उत्सव हुआ। मनुष्योंकी भारी भीड़ एकत्र हुई। गलियाँ और सड़कें लोगोंसे खचाखच भरी थीं। बहुत-से नट और नर्तक वहाँ अपनी कलाएँ दिखा रहे थे॥ १८ ॥
वहाँ सब ओर गाने-बजानेवाले तथा दूसरे लोगोंके शब्द गूँज रहे थे। दीन-दुःखियोंके लिये लुटाये गये सब प्रकारके रत्न वहाँ बिखरे पड़े थे॥ १९ ॥
राजा दशरथने सूत, मागध और वन्दीजनोंको देनेयोग्य पुरस्कार दिये तथा ब्राह्मणोंको धन एवं सहस्रों गोधन प्रदान किये॥ २० ॥
ग्यारह दिन बीतनेपर महाराजने बालकोंका नामकरण-संस्कार किया२। उस समय महर्षि वसिष्ठने प्रसन्नताके साथ सबके नाम रखे। उन्होंने ज्येष्ठ पुत्रका नाम ‘राम’ रखा। श्रीराम महात्मा