भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1798

‘यदि मन्त्रियोंके साथ उसकी बातचीत चल रही है तो वहाँ जो कुछ निश्चय हो अथवा रावणका जो निश्चित विचार हो, वह सब मुझे बताती रहो। यह मुझपर तुम्हारी बहुत बड़ी कृपा होगी’॥ ११ ॥

ऐसी बातें कहती हुर्इ सीतासे मधुरभाषिणी सरमाने उनके आँसुओंसे भीगे हुए मुखमण्डलको हाथसे पोंछते हुए इस प्रकार कहा— ॥ १२ ॥

‘मिथिलेशकुमारी जनकनन्दिनि! यदि तुम्हारी यही इच्छा है तो मैं जाती हूँ और शत्रुके अभिप्रायको जानकर अभी लौटती हूँ’॥ १३ ॥

ऐसा कहकर सरमाने उस राक्षसके समीप जाकर मन्त्रियोंसहित रावणकी कही हुर्इ सारी बातें सुनीं॥ १४ ॥

उस दुरात्माके निश्चयको सुनकर उसने अच्छी तरह समझ लिया और फिर वह शीघ्र ही सुन्दर अशोकवाटिकामें लौट आयी॥ १५ ॥

वहाँ प्रवेश करके उसने अपनी ही प्रतीक्षामें बैठी हुर्इ जनककिशोरीको देखा, जो उस लक्ष्मीके समान जान पड़ती थीं, जिसके हाथका कमल कहीं गिर गया हो॥

फिर लौटकर आयी हुर्इ प्रियभाषिणी सरमाको बड़े स्नेहसे गले लगाकर सीताने स्वयं उसे बैठनेके लिये आसन दिया और कहा—॥ १७ ॥

‘सखी! यहाँ सुखसे बैठकर सारी बातें ठीक-ठीक बताओ। उस क्रूर एवं दुरात्मा रावणने क्या निश्चय किया’॥

काँपती हुर्इ सीताके इस प्रकार पूछनेपर सरमाने मन्त्रियोंसहित रावणकी कही हुर्इ सारी बातें बतायीं—॥

‘विदेहनन्दिनि! राक्षसराज रावणकी माताने तथा रावणके प्रति अत्यन्त स्नेह रखनेवाले एक बूढ़े मन्त्रीने भी बड़ी-बड़ी बातें कहकर तुम्हें छोड़ देनेके लिये रावणको प्रेरित किया॥ २० ॥

‘राक्षसराज! तुम महाराज श्रीरामको सत्कारपूर्वक उनकी पत्नी सीता लौटा दो। जनस्थानमें जो अद्भुत घटना घटित हुर्इ थी, वही श्रीरामके पराक्रमको समझनेके लिये पर्याप्त प्रमाण एवं उदाहरण है॥ २१ ॥

‘(उनके सेवकोंमें भी अद्भुत शक्ति है) हनुमान्ने जो समुद्रको लाँघा, सीतासे भेंट की और युद्धमें बहुत-से राक्षसोंका वध किया—यह सब कार्य दूसरा कौन मनुष्य कर सकता है?’॥ २२