भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 181

वे सब बालक जब समझदार हुए, तब समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न हो गये। वे सभी लज्जाशील, यशस्वी, सर्वज्ञ और दूरदर्शी थे। ऐसे प्रभावशाली और अत्यन्त तेजस्वी उन सभी पुत्रोंकी प्राप्तिसे राजा दशरथ लोकेश्वर ब्रह्माकी भाँति बहुत प्रसन्न थे॥ ३४-३५ १/२ ॥

वे पुरुषसिंह राजकुमार प्रतिदिन वेदोंके स्वाध्याय, पिताकी सेवा तथा धनुर्वेदके अभ्यासमें दत्त-चित्त रहते थे॥ ३६ १/२ ॥

एक दिन धर्मात्मा राजा दशरथ पुरोहित तथा बन्धु-बान्धवोंके साथ बैठकर पुत्रोंके विवाहके विषयमें विचार कर रहे थे। मन्त्रियोंके बीचमें विचार करते हुए उन महामना नरेशके यहाँ महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्र पधारे॥ ३७-३८ १/२ ॥

वे राजासे मिलना चाहते थे। उन्होंने द्वारपालोंसे कहा— ‘तुमलोग शीघ्र जाकर महाराजको यह सूचना दो कि कुशिकवंशी गाधिपुत्र विश्वामित्र आये हैं’॥ ३९ १/२ ॥

उनकी यह बात सुनकर वे द्वारपाल दौड़े हुए राजाके दरबारमें गये। वे सब विश्वामित्रके उस वाक्यसे प्रेरित होकर मन-ही-मन घबराये हुए थे॥ ४० १/२ ॥

राजाके दरबारमें पहुँचकर उन्होंने इक्ष्वाकुकुल-नन्दन अवधनरेशसे कहा— ‘महाराज! महर्षि विश्वामित्र पधारे हैं’॥ ४१ १/२ ॥

उनकी वह बात सुनकर राजा सावधान हो गये। उन्होंने पुरोहितको साथ लेकर बड़े हर्षके साथ उनकी अगवानी की, मानो देवराज इन्द्र ब्रह्माजीका स्वागत कर रहे हों॥ ४२ १/२ ॥

विश्वामित्रजी कठोर व्रतका पालन करनेवाले तपस्वी थे। वे अपने तेजसे प्रज्वलित हो रहे थे। उनका दर्शन करके राजाका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा और उन्होंने महर्षिको अर्घ्य निवेदन किया॥ ४३ १/२ ॥

राजाका वह अर्घ्य शास्त्रीय विधिके अनुसार स्वीकार करके महर्षिने उनसे कुशल-मंगल पूछा॥ ४४ १/२ ॥

धर्मात्मा विश्वामित्रने क्रमशः राजाके नगर, खजाना, राज्य, बन्धु-बान्धव तथा मित्रवर्ग आदिके विषयमें कुशलप्रश्न किया— ॥ ४५ १/२ ॥

‘राजन्! आपके राज्यकी सीमाके निकट रहनेवाले शत्रु राजा आपके समक्ष नतमस्तक तो हैं? आपने उनपर विजय तो प्राप्त की है न? आपके यज्ञायाग आदि देवकर्म और अतिथि-सत्कार