भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 1812, कुल 2621 में से

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पृष्ठ 1812

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उनतालीसवाँ सर्ग

वानरोंसहित श्रीरामका सुवेल-शिखरसे लङ्कापुरीका निरीक्षण करना

वानर-यूथपतियोंने वह रात उस सुवेलपर्वतपर ही बितायी और वहाँसे उन वीरोंने लङ्काके वन और उपवन भी देखे॥ १ ॥

वे बड़े ही चौरस, शान्त, सुन्दर, विशाल और विस्तृत थे तथा देखनेमें अत्यन्त रमणीय जान पड़ते थे। उन्हें देखकर उन सब वानरोंको बड़ा विस्मय हुआ॥ २ ॥

चम्पा, अशोक, बकुल, शाल और ताल-वृक्षोंसे व्याप्त, तमाल-वनसे आच्छादित और नागकेसरोंसे आवृत्त लङ्कापुरी हिंताल, अर्जुन, नीप (कदम्ब), खिले हुए छितवन, तिलक, कनेर तथा पाटल आदि नाना प्रकारके दिव्य वृक्षोंसे जिनके अग्रभाग फूलोंके भारसे लदे थे तथा जिनपर लताबल्लरियाँ फैली हुई थीं, इन्द्रकी अमरावतीके समान शोभा पाती थी॥ ३—५ ॥

विचित्र फूलोंसे युक्त लाल कोमल पल्लवों, हरी-हरी घासों तथा विचित्र वनश्रेणियोंसे भी उस पुरीकी बड़ी शोभा हो रही थी॥ ६ ॥

जैसे मनुष्य आभूषण धारण करते हैं, उसी प्रकार वहाँके वृक्ष सुगन्धित फूल और अत्यन्त रमणीय फल धारण करते थे॥ ७ ॥

चैत्ररथ और नन्दनवनके समान वहाँका मनोहर वन सभी ऋतुओंमें भ्रमरोंसे व्याप्त हो रमणीय शोभा धारण करता था॥ ८ ॥

दात्यूह, कोयष्टि, बक और नाचते हुए मोर उस वनको सुशोभित करते थे। वनमें झरनोंके आसपास कोकिलकी कूक सुनायी पड़ती थी॥ ९ ॥

लङ्काके वन और उपवन नित्य मतवाले विहङ्गमोंसे विभूषित थे। वहाँ वृक्षोंकी डालियोंपर भौंरे मँडराते रहते थे। उनके प्रत्येक खण्डमें कोकिलाएँ कुहू-कुहू बोला करती थीं। पक्षी चहचहाते रहते थे। भृङ्गराजके गीत मुखरित होते थे। कुररके शब्द गूँजा करते थे। कोणालकके कलरव होते रहते थे तथा सारसोंकी स्वरलहरी सब ओर छायी रहती थी। कुछ वानरवीर उन वनों और उपवनोंमें घुस गये॥ १०-११ ॥

वे सभी वीर वानर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, उत्साही और आनन्दमग्न थे। उन महातेजस्वी वानरोंके वहाँ प्रवेश करते ही फूलोंके संसर्गसे सुगन्धित तथा घ्राणेन्द्रियको सुख

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