श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1833, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रतपन नामसे प्रसिद्ध एक घोर राक्षस था, जिसे रणभूमिमें परास्त करना अत्यन्त कठिन था। वह वीर निशाचर समराङ्गणमें प्रचण्ड वेगशाली नलके साथ युद्ध करने लगा॥ १३ ॥
धर्मके बलवान् पुत्र महाकपि सुषेण राक्षस विद्युन्मालीके साथ लोहा लेने लगे॥ १४ ॥
इसी प्रकार अन्यान्य भयानक वानर बहुतोंके साथ युद्ध करनेके पश्चात् दूसरे-दूसरे राक्षसोंके साथ सहसा द्वन्द्वयुद्ध करने लगे॥ १५ ॥
वहाँ राक्षस और वानरवीर अपनी-अपनी विजय चाहते थे। उनमें बड़ा भयंकर और रोमाञ्चकारी युद्ध होने लगा॥ १६ ॥
वानरों और राक्षसोंके शरीरोंसे निकलकर बहुत-सी खूनकी नदियाँ बहने लगीं। उनके सिरके बाल ही वहाँ शैवाल (सेवार) के समान जान पड़ते थे। वे नदियाँ सैनिकोंकी लाशरूपी काष्ठसमूहोंको बहाये लिये जाती थीं॥ १७ ॥
जिस प्रकार इन्द्र वज्रसे प्रहार करते हैं, उसी तरह इन्द्रजित् मेघनादने शत्रुसेनाको विदीर्ण करनेवाले वीर अङ्गदपर गदासे आघात किया॥ १८ ॥
किंतु वेगशाली वानर श्रीमान् अङ्गदने उसकी गदा हाथसे पकड़ ली और उसी गदासे इन्द्रजित्के सुवर्णजटित रथको सारथि और घोड़ोंसहित चूर-चूर कर डाला॥ १९ ॥
प्रजङ्घने सम्पातिको तीन बाणोंसे घायल कर दिया। तब सम्पातिने भी अश्वकर्ण नामक वृक्षसे युद्धके मुहानेपर प्रजङ्घको मार डाला॥ २० ॥
महाबली जम्बुमाली रथपर बैठा हुआ था। उसने कुपित होकर समराङ्गणमें एक रथ-शक्तिके द्वारा हनुमान्जीकी छातीपर चोट की॥ २१ ॥
परंतु पवननन्दन हनुमान् उछलकर उसके उस रथपर चढ़ गये और तुरंत ही थप्पड़से मारकर उन्होंने उस राक्षसके साथ ही उस रथको भी चौपट कर दिया (जम्बुमाली मर गया)॥ २२ ॥
दूसरी ओर भयानक राक्षस प्रतपन भीषण गर्जना करके नलकी ओर दौड़ा। शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले उस राक्षसने अपने तीखे बाणोंसे नलके शरीरको क्षतवि क्षत कर दिया। तब नलने तत्काल ही उसकी दोनों आँखें निकाल लीं॥ २३ ॥
उधर राक्षस प्रघस वानरसेनाको कालका ग्रास बना रहा था। यह देख वानरराज सुग्रीवने सप्तपर्ण नामक वृक्षसे उसे वेगपूर्वक मार गिराया॥ २४ १/२ ॥