भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 1872, कुल 2621 में से

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पृष्ठ 1872

महाबली घोड़े थे, जिनके ऊपर शूरवीर सैनिक सवार थे, वे भी युद्धके लिये निकले॥ ११ ॥

युद्धके उद्देश्यसे प्रस्थित हुई राक्षसोंकी वह सारी सेना वर्षाकालमें गर्जते हुए बिजलियोंसहित मेघके समान शोभा पा रही थी॥ १२ ॥

वह सेना लङ्काके दक्षिणद्वारसे निकली, जहाँ वानर-यूथपति अङ्गद राह रोके खड़े थे। उधरसे निकलते ही उन राक्षसोंके सामने अशुभसूचक अपशकुन होने लगा॥

मेघरहित आकाशसे तत्काल दुःसह उल्कापात होने लगे। भयानक गीदड़ मुँहसे आगकी ज्वाला उगलते हुए अपनी बोली बोलने लगे॥ १४ ॥

घोर पशु ऐसी बोली बोलने लगे, जिससे राक्षसोंके संहारकी सूचना मिल रही थी। युद्धके लिये आते हुए योद्धा बुरी तरह लड़खड़ाकर गिर पड़ते थे। इससे उनकी बड़ी दारुण अवस्था हो जाती थी॥ १५ ॥

इन उत्पातसूचक लक्षणोंको देखकर भी महाबली वज्रदंष्ट्रने धैर्य नहीं छोड़ा। वह तेजस्वी वीर युद्धके लिये उत्सुक होकर निकला॥ १६ ॥

तीव्रगतिसे आते हुए उन राक्षसोंको देखकर विजयलक्ष्मीसे सुशोभित होनेवाले वानर बड़े जोर-जोरसे गर्जना करने लगे। उन्होंने अपने सिंहनादसे सम्पूर्ण दिशाओंको गुँजा दिया॥ १७ ॥

तदनन्तर भयानक रूप धारण करनेवाले घोर वानरोंका राक्षसोंके साथ तुमुल युद्ध आरम्भ हुआ। दोनों दलोंके योद्धा एक-दूसरेका वध करना चाहते थे॥ १८ ॥

वे बड़े उत्साहसे युद्धके लिये निकलते; परंतु देह और गर्दन कट जानेसे पृथ्वीपर गिर पड़ते थे। उस समय उनके सारे अङ्ग रक्तसे भीग जाते थे॥ १९ ॥

युद्धसे कभी पीछे न हटनेवाले और परिघ-जैसी बाँहोंवाले कितने ही शूरवीर एक-दूसरेके निकट पहुँचकर परस्पर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार करते थे॥

उस युद्धस्थलमें प्रयुक्त होनेवाले वृक्षों, शिलाओं और शस्त्रोंका महान् एवं घोर शब्द जब कानोंमें पड़ता था, तब वह हृदयको विदीर्ण-सा कर देता था॥ २१ ॥

वहाँ रथके पहियोंकी घर्घर्राहट, धनुषकी भयानक टंकार तथा शङ्ख, भेरी और मृदङ्गोंका शब्द एकमें मिलकर बड़ा भयंकर प्रतीत होता था॥ २२ ॥

कुछ योद्धा अपने हथियार फेंककर बाहुयुद्ध करने लगते थे। थप्पड़ों, लातों, मुक्कों, वृक्षों और घुटनोंकी मार खाकर कितने ही राक्षसोंके शरीर चूर-चूर हो गये थे। रणदुर्मद वानरोंने

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