श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1879, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंयद्यपि वह समय सुदिनका था, तथापि सहसा रूखी हवासे युक्त दुर्दिन छा गया। सभी पशु और पक्षी क्रूर एवं भयदायक बोली बोलने लगे॥ ११ १/२ ॥
अकम्पनके कन्धे सिंहके समान पुष्ट थे। उसका पराक्रम व्याघ्रके समान था। वह पूर्वोक्त उत्पातोंकी कोऽइ परवा न करके रणभूमिकी ओर चला॥ १२ १/२ ॥
जिस समय वह राक्षस दूसरे राक्षसोंके साथ लङ्कासे निकला, उस समय ऐसा महान् कोलाहल हुआ कि समुद्रमें भी हलचल-सी मच गयी॥ १३ १/२ ॥
उस महान् कोलाहलसे वानरोंकी वह विशाल सेना भयभीत हो गयी। युद्धके लिये उपस्थित हो वृक्षों और शैल-शिखरोंका प्रहार करनेवाले उन वानरों और राक्षसोंमें महाभयंकर युद्ध होने लगा॥ १४-१५ ॥
श्रीराम और रावणके निमित्त आत्मत्यागके लिये उद्यत हुए वे समस्त शूरवीर अत्यन्त बलशाली और पर्वतके समान विशालकाय थे॥ १६ ॥
वानर तथा राक्षस एक-दूसरेके वधकी इच्छासे वहाँ एकत्र हुए थे। वे युद्धस्थलमें अत्यन्त वेगशाली थे। कोलाहल करते और एक-दूसरेको लक्ष्य करके क्रोधपूर्वक गर्जते थे। उनका महान् शब्द सुदूरतक सुनायी देता था॥ १७ १/२ ॥
वानरों और राक्षसोंद्वारा उड़ायी गयी लाल रंगकी धूल बड़ी भयंकर जान पड़ती थी। उसने दसों दिशाओंको आच्छादित कर लिया था॥ १८ १/२ ॥
परस्पर उड़ायी हुऽइ वह धूल हिलते हुए रेशमी वस्त्रके समान पाण्डुवर्णकी दिखायी देती थी। उसके द्वारा समराङ्गणमें समस्त प्राणी ढक गये थे। अतः वानर और राक्षस उन्हें देख नहीं पाते थे॥ १९ १/२ ॥
उस धूलसे आच्छादित होनेके कारण ध्वज, पताका, ढाल, घोड़ा, अस्त्र-शस्त्र अथवा रथ कोऽइ भी वस्तु दिखायी नहीं देती थी॥ २० १/२ ॥
उन गर्जते और दौड़ते हुए प्राणियोंका महाभयंकर शब्द युद्धस्थलमें सबको सुनायी पड़ता था, परंतु उनके रूप नहीं दिखायी देते थे॥ २१ १/२ ॥
अन्धकारसे आच्छादित युद्धस्थलमें अत्यन्त कुपित हुए वानर वानरोंपर ही प्रहार कर बैठते थे तथा राक्षस राक्षसोंको ही मारने लगते थे॥ २२ १/२ ॥