भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 1883, कुल 2621 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1883

राक्षसोंको भय देनेवाले हनुमान् अत्यन्त कुपित होकर शत्रुओंपर आक्रमण कर रहे थे। उस समय वीर अकम्पनने उन्हें देखा। देखते ही वह क्षोभसे भर गया और जोर-जोरसे गर्जना करने लगा॥ २५ ॥

अकम्पनने देहको विदीर्ण कर देनेवाले चौदह पैने बाण मारकर महापराक्रमी हनुमान्‌को घायल कर दिया॥ २६ ॥

इस प्रकार नाराचों और तीखी शक्तियोंसे छिदे हुए वीर हनुमान् उस समय वृक्षोंसे व्याप्त पर्वतके समान दिखायी देते थे॥ २७ ॥

उनका सारा शरीर रक्तसे रँग गया था, इसलिये वे महापराक्रमी महाबली और महाकाय हनुमान् खिले हुए अशोक एवं धूमरहित अग्निके समान शोभा पा रहे थे॥

तदनन्तर महान् वेग प्रकट करके हनुमान्‌जीने एक दूसरा वृक्ष उखाड़ लिया और तुरंत ही उसे राक्षसराज अकम्पनके सिरपर दे मारा॥ २९ ॥

क्रोधसे भरे वानरश्रेष्ठ महात्मा हनुमान्‌के चलाये हुए उस वृक्षकी गहरी चोट खाकर राक्षस अकम्पन पृथ्वीपर गिरा और मर गया॥ ३० ॥

जैसे भूकम्प आनेपर सारे वृक्ष काँपने लगते हैं, उसी प्रकार राक्षसराज अकम्पनको रणभूमिमें मारा गया देख समस्त राक्षस व्यथित हो उठे॥ ३१ ॥

वानरोंके खदेड़नेपर वहाँ परास्त हुए वे सब राक्षस अपने अस्त्र-शस्त्र फेंककर डरके मारे लङ्कामें भाग गये॥ ३२ ॥

उनके केश खुले हुए थे। वे घबरा गये थे और पराजित होनेसे उनका घमंड चूर-चूर हो गया था। भयके कारण उनके अङ्गोंसे पसीने चू रहे थे और इसी अवस्थामें वे भाग रहे थे॥ ३३ ॥

भयके कारण एक-दूसरेको कुचलते हुए वे भागकर लङ्कापुरीमें घुस गये। भागते समय वे बारंबार पीछे घूम-घूमकर देखते रहते थे॥ ३४ ॥

उन राक्षसोंके लङ्कामें घुस जानेपर समस्त महाबली वानरोंने एकत्र हो वहाँ हनुमान्‌जीका अभिनन्दन किया॥ ३५ ॥

उन शक्तिशाली हनुमान्‌जीने भी उत्साहित हो यथायोग्य अनुकूल बर्ताव करते हुए उन समस्त वानरोंका समादर किया॥ ३६ ॥