भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1889

अत्यन्त वेगशाली, समर्थ तथा एक-दूसरेके वधकी इच्छावाले योद्धा परस्पर ललकार रहे थे। उनका महान् कोलाहल सबको सुनायी देता था॥ ४३ ॥

इसी समय दुर्बुद्धि प्रहस्त विजयकी अभिलाषासे वानरराज सुग्रीवकी सेनाकी ओर बढ़ा और जैसे पतंग मरनेके लिये आगपर टूट पड़ता है, उसी प्रकार वह बढ़े हुए वेगवाली उस वानरसेनामें घुसनेकी चेष्टा करने लगा॥ ४४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें सत्तावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५७ ॥