भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1896

पर्वत और मेघोंके समान काले एवं विशाल रूपवाले मांसाहारी राक्षसोंसे, जिनके नेत्र प्रज्वलित अग्निके समान उद्दीप्त हो रहे थे, घिरा हुआ राक्षस-राजाधिराज रावण भूतगणोंसे घिरे हुए देवेश्वर रुद्रके समान शोभा पाता था॥ ९ ॥

महातेजस्वी रावणने लङ्कापुरीसे सहसा निकलकर महासागर और मेघोंके समान गर्जना करनेवाली उस भयंकर वानर-सेनाको देखा, जो हाथोंमें पर्वत-शिखर एवं वृक्ष लिये युद्धके लिये तैयार थी॥ १० ॥

उस अत्यन्त प्रचण्ड राक्षससेनाको देखकर नागराज शेषके समान भुजावाले, वानर-सेनासे घिरे हुए तथा पुष्ट शोभा-सम्पत्तिसे युक्त श्रीरामचन्द्रजीने शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ विभीषणसे पूछा—॥ ११ ॥

‘जो नाना प्रकारकी ध्वजा-पताकाओं और छत्रोंसे सुशोभित, प्रास, खड्ग और शूल आदि अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न, अजेय, निडर योद्धाओंसे सेवित और महेन्द्रपर्वत-जैसे विशालकाय हाथियोंसे भरी हुई है, ऐसी यह सेना किसकी है?’॥ १२ ॥

इन्द्रके समान बलशाली विभीषण श्रीरामकी उपर्युक्त बात सुनकर महामना राक्षसशिरोमणियोंके बल एवं सैनिकशक्तिका परिचय देते हुए उनसे बोले—॥ १३ ॥

‘राजन्! यह जो महामनस्वी वीर हाथीकी पीठपर बैठा है, जिसका मुख नवोदित सूर्यके समान लाल रंगका है तथा जो अपने भारसे हाथीके मस्तकमें कम्पन उत्पन्न करता हुआ इधर आ रहा है, इसे आप अकम्पन* समझें॥ १४ ॥

‘वह जो रथपर चढ़ा हुआ है, जिसकी ध्वजापर सिंहका चिह्न है, जिसके दाँत हाथीके समान उग्र और बाहर निकले हुए हैं तथा जो इन्द्रधनुषके समान कान्तिमान् धनुष हिलाता हुआ आ रहा है, उसका नाम इन्द्रजित् है। वह वरदानके प्रभावसे बड़ा प्रबल हो गया है॥ १५ ॥

‘यह जो विन्ध्याचल, अस्ताचल और महेन्द्रगिरिके समान विशालकाय, अतिरथी एवं अतिशय वीर धनुष लिये रथपर बैठा है तथा अपने अनुपम धनुषको बारंबार खींच रहा है, इसका नाम अतिकाय है। इसकी काया बहुत बड़ी है॥ १६ ॥

‘जिसके नेत्र प्रातःकाल उदित हुए सूर्यके समान लाल हैं तथा जिसकी आवाज घण्टाकी ध्वनिसे भी उत्कृष्ट है, ऐसे क्रूर स्वभाववाले गजराजपर आरूढ़ होकर जो जोर-जोरसे गर्जना कर रहा है, वह महामनस्वी वीर महोदर नामसे प्रसिद्ध है॥ १७ ॥