श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘इसी तरह उमा, नन्दीश्वर, रम्भा और वरुण-कन्याने भी जैसा-जैसा कहा था, वैसा ही परिणाम मुझे प्राप्त हुआ है। * सच है ऋषियोंकी बात कभी झूठी नहीं होती॥ ११ १/२ ॥
‘ये शाप ही मुझपर भय अथवा संकट लानेमें कारण हुए हैं। इस बातको जानकर अब तुमलोग आये हुए संकटको टालनेका प्रयत्न करो। राक्षसलोग राजमार्गों तथा गोपुरोंके शिखरोंपर उनकी रक्षाके लिये डटे रहें॥
‘साथ ही जिसके गाम्भीर्यकी कहीं तुलना नहीं है, जो देवताओं और दानवोंका दर्प दलन करनेवाला है तथा ब्रह्माजीके शापसे प्राप्त हुई निद्रा जिसे सदा अभिभूत किये रहती है, उस कुम्भकर्णको भी जगाया जाय’॥ १३ १/२ ॥
‘प्रहस्त मारा गया और मैं भी समराङ्गणमें परास्त हो गया’ ऐसा जानकर महाबली रावणने राक्षसोंकी भयानक सेनाको आदेश दिया कि ‘तुमलोग नगरके दरवाजोंपर रहकर उनकी रक्षाके लिये यत्न करो। परकोटोंपर भी चढ़ जाओ और निद्राके अधीन हुए कुम्भकर्णको जगा दो॥ १४-१५ १/२ ॥
‘(मैं तो दुःखी, चिन्तित और अपूर्णकाम होकर जाग रहा हूँ और) वह राक्षस कामभोगसे अचेत हो बड़ी निश्चिन्तताके साथ सुखपूर्वक सो रहा है। वह कभी नौ, कभी सात, कभी दस और कभी आठ मासतक सोता रहता है। यह आजसे नौ महीने पहले मुझसे सलाह करके सोया था॥ १६-१७ ॥
‘अतः तुमलोग महाबली कुम्भकर्णको शीघ्र जगा दो। महाबाहु कुम्भकर्ण सभी राक्षसोंमें श्रेष्ठ है। वह युद्धस्थलमें वानरों और उन राजकुमारोंको भी शीघ्र ही मार डालेगा॥ १८ ॥
‘समस्त राक्षसोंमें प्रधान यह कुम्भकर्ण समरभूमिमें हमारे लिये सर्वोत्तम विजय-वैजयन्तीके समान है; किंतु खेदकी बात है कि वह मूर्ख ग्राम्यसुखमें आसक्त होकर सदा सोता रहता है॥ १९ ॥
‘यदि कुम्भकर्णको जगा दिया जाय तो इस भयंकर संग्राममें मुझे रामसे पराजित होनेका शोक नहीं होगा॥ २० ॥
‘यदि इस घोर संकटके समय भी कुम्भकर्ण मेरी सहायता करनेमें समर्थ नहीं हो रहा है तो इन्द्रके तुल्य बलशाली होनेपर भी उससे मेरा प्रयोजन ही क्या है— मैं उसे लेकर क्या करूँगा?’॥ २१ ॥