श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1915, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंजम्हाऽइ लेने लगा, उस समय उसका मुख बड़वानलके समान विकराल जान पड़ता था॥ ५७ ॥
जम्हाऽइ लेते समय कुम्भकर्णका पाताल-जैसा मुख मेरुपर्वतके शिखरपर उगे हुए सूर्यके समान दिखायी देता था॥ ५८ ॥
इस तरह जम्हाऽइ लेता हुआ वह अत्यन्त बलशाली निशाचर जब जगा, तब उसके मुखसे जो साँस निकलती थी, वह पर्वत-से चली हुऽइ वायुके समान प्रतीत होती थी॥
नींदसे उठे हुए कुम्भकर्णका वह रूप प्रलयकालमें समस्त प्राणियोंके संहारकी इच्छा रखनेवाले कालके समान जान पड़ता था॥ ६० ॥
उसकी दोनों बड़ी-बड़ी आँखें प्रज्वलित अग्नि और विद्युत्के समान दीप्तिमती दिखायी देती थीं। वे ऐसी लगती थीं मानो दो महान् ग्रह प्रकाशित हो रहे हों॥ ६१ ॥
तदनन्तर राक्षसोंने वहाँ जो अनेक प्रकारकी खाने-पीनेकी वस्तुएँ प्रचुर मात्रामें रखी गयी थीं, वे सब-की-सब कुम्भकर्णको दिखायीं। वह महाबली राक्षस बात-की-बातमें बहुतेरे भैंसों और सूअरोंको चट कर गया॥ ६२ ॥
उसे बड़ी भूख लगी थी, अतः उसने भरपेट मांस खाया और प्यास बुझानेके लिये रक्त पान किया। तदनन्तर उस इन्द्रद्रोही निशाचरने चर्बीसे भरे हुए कितने ही घड़े साफ कर दिये और वह कऽइ घड़े मदिरा भी पी गया॥ ६३ ॥
तब उसे तृप्त जानकर राक्षस उछल-उछलकर उसके सामने आये और उसे सिर झुका प्रणाम करके उसके चारों ओर खड़े हो गये॥ ६४ ॥
उस समय उसके नेत्र निद्राके कारण अप्रसन्न— कुछ-कुछ खुले हुए थे और मलिन जान पड़ते थे। उसने सब ओर दृष्टि डालकर वहाँ खड़े हुए निशाचरोंको देखा॥ ६५ ॥
निशाचरोंमें श्रेष्ठ कुम्भकर्णने उन सब राक्षसोंको सान्त्वना दी और अपने जगाये जानेके कारण विस्मित हो उनसे इस प्रकार पूछा—॥ ६६ ॥
‘तुमलोगोंने इस प्रकार आदर करके मुझे किसलिये जगाया है? राक्षसराज रावण कुशलसे हैं न? यहाँ कोऽइ भय तो नहीं उपस्थित हुआ है?॥ ६७ ॥
‘अथवा निश्चय ही यहाँ दूसरोंसे कोऽइ महान् भय उपस्थित हुआ है, जिसके निवारणके लिये तुमलोगोंने इतनी उतावलीके साथ मुझे जगाया है॥ ६८ ॥